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जागरण Contest


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परिणाम – फागुनी बहार प्रतियोगिता

Posted On: 23 Apr, 2014  
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चुनाव मंथन प्रतियोगिता: कैसी हो आपकी सरकार

Posted On: 2 Apr, 2014  
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परिणाम – प्रणयोत्सव पर्व

Posted On: 13 Mar, 2014  
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चयनित साहित्य उन्नायकों की शैलीगत विशिष्टता

Posted On: 10 Feb, 2014  
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परिणाम – साहित्य सरताज प्रतियोगिता

Posted On: 10 Feb, 2014  
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प्रणयोत्सव पर्व: उस अधूरे प्रेम पत्र को करें पूरा

Posted On: 29 Jan, 2014  
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साहित्य सरताज: नववर्ष का आरंभ रचनात्मकता के साथ

Posted On: 27 Dec, 2013  
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सूचना – ब्लॉगिंग शिखर सम्मान स्थगन

Posted On: 23 Dec, 2013  
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ब्लॉग शिरोमणि प्रतियोगिता – अंतिम परिणाम

Posted On: 11 Oct, 2013  
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44 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा:

आदरणीय संचालक महोदय जी सादर नमस्कार मंच पर सप्ताह में कम से कम एक ब्लॉग लिखना बेहद अच्छा लगता है अनुपम मंच पर अन्य ब्लॉगर साथियों के ब्लॉग्स और जागरण ब्लॉग पढने से कई नई और दिशा निर्देशन ब्लॉग्स भी पढने को उपलब्ध हो जाते हैं ..मुझे प्रतियोगिताओं में भाग लेना भी अच्छा लगता है...आप के इस प्रतिष्ठित मंच ने मुझे बहुत कुछ सीखने के अवसर के साथ ही एक पहचान भी दी है मैं आप सब की आभारी हूँ ... लेखन के क्षेत्र में जिस तरह से इस अनुपम मंच ने हमारी मदद की है हम उसके लिए कृतज्ञ हैं. चाहती हूँ विचारों की गंगोत्री रूपी यह मंच हमें हमेशा नई सोच नए विचारों की प्रवाहमयी पावन गंगा से सिक्त और तृप्त करता रहे .... इस विशाल परिवार से जुड़े प्रत्येक सदस्य को मेरा बहुत बहुत धन्यवाद वैचारिक यात्रा में आप सब के साथ यमुना

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

आदरणीया मीनाक्षीजी, यमुना पाठकजी और आदरणीय अशोक शुक्लाजी,दीपक पांडेजी और राजेश कश्यपजी आप सभी को बहुत बहुत बधाई.प्रतियोगिता के आयोजन के लिए जागरण जंक्शन परिवार को बधाई.आप ने अपने वक्तव्य में कहा है कि-" पूर्व घोषित नियमानुसार कुल प्राप्त प्रविष्ठियों के आधार पर हमें 10 श्रेष्ठ प्रतिभागियों का चयन करना था। किंतु प्रविष्टियों की संख्या आनुपातिक रूप से कम होने के कारण पूर्व निर्धारित 10 की बजाय हमने श्रेष्ठतम 5 विजेताओं का चुनाव किया है." प्रतियोगिता में कम लोगों के भाग लेने पर विचार करना चाहिए.मेरे विचार से कोई पुरस्कार सामग्री डे नहीं होना और घोषित परिणामो से सबका संतुष्ट नहीं होना,लोगों की रूचि कम होने की यही मुख्य वजह है.इस ओर जागरण जंक्शन परिवार को ध्यान देना चाहिए.

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा: DR. SHIKHA KAUSHIK DR. SHIKHA KAUSHIK

आदरणीय अनिरुद्ध शर्मा जी,अशोक शुक्ला जी,डॉ. श्याम गुप्ता जी,विवेक सचान जी,आचार्य विजय गुंजन जी,जे.एल. सिंह जी,आदित्य उपाध्याय जी,और आदरणीया यमुना पाठक जी,रंजना गुप्ता जी,शोभा भारद्वाज जी,आप सबको बहुत बहुत बधाई.आप सबने अपनी उत्कृष्ट रचनाओ में ढाई आखर वाले " प्रेम " शब्द की बहुत सुंदर और समसामयिक विवेचना की है.इनमे से अधिकतर ब्लॉगर मित्रों की रचनाये मैंने पढ़ी हैं और मुझे बहुत अच्छी लगी हैं.एक बार पुन:आप सबको बधाई." प्रणयोत्सव पर्व " प्रतियोगिता के आयोजन हेतु जागरण जंक्शन परिवार को भी बधाई.इस देश में तो अधिकतर लोगों को प्रेम शब्द से ही लोगों को नफरत है.जागरण परिवार ने इस विषय पर प्रतियोगिता आयोजित करने की हिम्मत की,ये बहुत साहस और खुलेपन की बात है.अंत में कुछ शेर अर्ज हैं-आँखों को जब किसी की चाहत हो जाती है, उसे देख के ही दिल को राहत हो जाती है. कैसे भूल सकता है कोई किसी को ऐ दोस्त, जब किसी को किसी की आदत हो जाती है. मोहोब्बत कुछ इस कदर हो जाती है उसे, के रब से पहले उसकी इबादत हो जाती है.

के द्वारा:

के द्वारा: neena neena

के द्वारा: Lavanya Vilochan Lavanya Vilochan

के द्वारा: pratima gupta pratima gupta

आप ने ठीक कहा ' बहर' की चर्चा करें या ना करें क्या उसका औचित्य समाप्त हो जाएगा ? जनाब चर्चा करें या ना करें पर निर्धारित मानक मानदंड तो रहेंगे ही ये तो हमसब के ऊपर हैं जहाँतक क्रम को आप ने झंझट कहा है , आप चाहें तो आप जैसे समर्थ लोग केवल रदीफ से भी काम चला ले सकते हैं , आप चाहें तो बहर से मुक्त होकर भी ग़ज़ल कह सकते हैं क्या आज़ाद ग़ज़ल ग़ज़ल नहीं है ? पर महानुभाव ! जब काफ़िया और रदीफ की बात होगी तो पहले काफ़िया ही होगा वजन तो वजन है क्यों कि काफ़िया और रदीफ का मनोरम व मंजुल संगम ग़ज़ल के शिल्प व शैलीगत वैशिष्ट्य में चार कांड लगा देता है | वैसे जागरण जंक्शन के संपादक - मंडल के सदस्यों के प्रति यह आक्षेप कि उन्हें काफ़िया- रदीफ व बहर की समझ नहीं है ' अशोभनीय लगा | इसे उद्वेलित मन की खिन्नता ही कही जाएगी !

के द्वारा: Acharya Vijay Gunjan Acharya Vijay Gunjan

आदरणीय संतलाल करुण जी और जागरण जंक्शन परिवार,सादर हरिस्मरण और शुभप्रभात ! आपने बहुत अच्छी बात कही है.मैं तो यहांतक कहूंगा कि बुरा न मानते हुए (इगो हर्ट का मुद्दा न बनाते हुए) प्रतियोगिता में लिखने वालों से लेकर इन लेखों को जांचनेवालो तक सबको आदरणीय केशरीजी के लेखों का विधिवत अध्ययन करना चाहिए.मैंने स्वयं उनके लेख को पढ़ा जो ग़ज़ल विधा के प्राम्भिक ज्ञान की दृष्टि से अद्वितीय है.गलती हर इंसान से होती है और अपनी गलती स्वीकार कर लेना सबसे बड़ी महानता है.अपनी रचना की कमियों को निखारते हुए आगे बढ़ना अतिउत्तम है.इसी तरह से निर्णायकों को भी चाहिए कि प्रतियोगिता में आयी रचनाओ का विधिवत अध्ययन करें,कमेंट के आधार पर परिणाम घोषित करने की महज एक औपचारिकता पूरी न करें.प्राप्त रचनाओ में केवल प्रसिद्द नाम न ढूंढकर अद्वितीय रचना भी ढूंढें.भविष्य में पूर्ण परिपक्वता और पूर्ण पारदर्शिता की उम्मीद करते हुए अपनी शुभकामनाओं सहित अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव जागरण जंक्शन परिवार को सादर समर्पित करते हुए इसकी इतिश्री करता हूँ.

के द्वारा:

आदरणीय आचार्यजी,सबसे पहले तो मेरी ईश्वर से प्रार्थना है की आपके पुत्र शीघ्र स्वस्थ हों.मेरा आशीर्वाद और मेरी शुभकामनएं वहाँतक पहुंचे.हम सब लोगों की दुआएं आपके पुत्र के साथ हैं.वो शीघ्र से शीघ्र स्वस्थ हों.आप मंच की शोभा हैं और एक बहुत अच्छे कवी हैं.मैं स्वयं आपकी रचनाओं का प्रशंसक हूँ.इस मंच की कमियों और साहित्यिक स्तर में सुधार की जो सार्थक बहस चल रही है,कृपया उसे चलने दें,इससे मंच के उज्जवल विकास में बहुत मदद मिलेगी और सभी रचनाकारों की रचनाओं में और निखार आएगा.ये पूरी बहस किसी भी ब्लॉगर से नहीं है.ये आदरणीय जागरण जंक्शन परिवार से हो रही चर्चा है.इसका उद्देश्य केवल इतना ही है की सोने जैसी इस मंच की रचनाओं में और निखार लाने के लिए उसे आलोचना रूपी अग्नि में तपाया जा रहा है.हम सब ब्लागरों को आदरणीय वीनस केसरी जी का एहसान मानते हुए उनका शुक्रिया अदा करना चाहिए की उन्होंने इस और सबका ध्यान आकर्षित किया है.आदरणीय संतलाल करुण जी ने और आदरणीया यमुना पाठक जी ने जिस विनम्र तरीके से और एक शिक्षाप्रद रूप में आदरणीय वीनस केसरी जी को बातों को ग्रहण किया है उसके लिए दोनों महान रचनाकारों को मेरा सलाम.आलोचना सदैव उनकी करनी चाहिए,जिनसे आपको बहुत लगाव हो.आदरणीय वीनस केसरी जी आपको भी मेरा सलाम और और आपके सभी लेख आजकल मैं एक क्षेत्र की तरह से पढ़ रहा हूँ.अपनी पहली ग़ज़ल जब भी मैं लिंखूंगा,वो आपको समर्पित होगी.आप से मेरा निवेदन है की मंच पर आप बने रहिये.आपसे कुछ न कुछ सभी ब्लागरों को सिखने को मिलेगा.

के द्वारा:

मुझे नहीं पता था की इस मंच पर इस तारक की व्यर्थ बात और कुतर्क दिए जायेंगे ग़ज़ल की मूल बातों में रदीफ़ काफ़िया और बह्र सबसे पहले आते हैं .. अब इसमें क्रम का कौन सा झंझट आ गया? अगर हम सीधे रदीफ़ के लेख पर चर्चा कर लें तो क्या रदीफ़ ग़ज़ल में सबसे पहले आ जाएगा ? अगर हम बह्र की चर्चा ना करें तो क्या बहर का औचित्य समाप्त हो जाएगा ? जनाब तथ्यपरक बातें कीजिये ,,, व्यर्थ के कुतर्क दे कर आप खुद अपनी स्थिति स्पष्ट कर रहे हैं जहां तक मुझे याद पड़ता है आज से तीन साल पहले जब मैं इस मंच पर सक्रीय हुआ था तब भी इसी तरह से कुछ जमे हुए ब्लोगर्स ने उलटे सीधे तर्क दिए थे और मेरा मन मंच से उचाट गया ... इस बार भी शायद ऐसा ही कुछ हो !!!!!

के द्वारा:

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा February 12, 2014मान्यवर मानुभाव वीनस केसरी जी , यथोचित ! या तो आप पूर्वाग्रह से पीड़ित हैं या फिर किसी ग़म के मारे हैं | पहले यह तो आप तय कीजिये कि पहले रदीफ होगा या क़ाफिया या फिर पहले क़ाफिया और बाद में रदीफ क्यों कि क्रमबद्धता नाम की भी कोई चीज होती है | मेरी जानकारी में ” क़ाफिया – रदीफ ” ना कि ” रदीफ – क़ाफिया ” अब आइये ” बहर ” की गली में | मुझे लगता है कि एतद्सम्बन्धी ज्ञान को भी आप को अपडेट कर लेना चाहिए | आप को फिर से अपने ज्ञान को संशोधित और परिवर्धित कर ही दुबारा मेनका को पढ़ने की आवश्यकता है | ज़रा गंगोयमन अर्थात् गंगा-यमुनी संस्कृति की धारा में डूबें फिर पढ़ें ! आनंद आयेगा | विपंची न बने ! कहना तो बहुत कुछ है पर उलझन में हूँ | कल काफी मेहनत कर देर रात तक बहर व छन्दादि के विषय में लिखा था पर तकनीकी खराबी के कारण पोस्ट न हो सका , फिर बेटे की तबीयत अचानक खराब हो गई और पी.एम्.सी.एच. जाना पड़ा वापस तीन बजे भोर में आना हुआ ! अब आलेख के साथ मंच पर ही मुलाक़ात होगी |

के द्वारा: Acharya Vijay Gunjan Acharya Vijay Gunjan

मान्यवर मानुभाव वीनस केसरी जी , यथोचित ! या तो आप पूर्वाग्रह से पीड़ित हैं या फिर किसी ग़म के मारे हैं | पहले यह तो आप तय कीजिये कि पहले रदीफ होगा या क़ाफिया या फिर पहले क़ाफिया और बाद में रदीफ क्यों कि क्रमबद्धता नाम की भी कोई चीज होती है | मेरी जानकारी में " क़ाफिया - रदीफ " ना कि " रदीफ - क़ाफिया " अब आइये " बहर " की गली में | मुझे लगता है कि एतद्सम्बन्धी ज्ञान को भी आप को अपडेट कर लेना चाहिए | आप को फिर से अपने ज्ञान को संशोधित और परिवर्धित कर ही दुबारा मेनका को पढ़ने की आवश्यकता है | ज़रा गंगोयमन अर्थात् गंगा-यमुनी संस्कृति की धारा में डूबें फिर पढ़ें ! आनंद आयेगा | विपंची न बने ! कहना तो बहुत कुछ है पर उलझन में हूँ | कल काफी मेहनत कर देर रात तक बहर व छन्दादि के विषय में लिखा था पर तकनीकी खराबी के कारण पोस्ट न हो सका , फिर बेटे की तबीयत अचानक खराब हो गई और पी.एम्.सी.एच. जाना पड़ा वापस तीन बजे भोर में आना हुआ ! अब आलेख के साथ मंच पर ही मुलाक़ात होगी |

के द्वारा: Acharya Vijay Gunjan Acharya Vijay Gunjan

जिन्हे ग़ज़ल की a b c d भी नहीं मालूम है क्या उन्हें ग़ज़ल लिखने का नैतिक अधिकार है ? पहले अच्छी तरह से जानकारी प्राप्त कर लीजिये,फिर बहस के लिए सामने आइये.दोष आप से ज्यादा तो प्रतियोगिता के निर्णायकों का है,जिन्हे खुद ये सब नहीं मालूम है और जो अपने ही बनाएं हुए प्रतियोगिता के नियमों का पालन नहीं कर पा रहे है.उन्हें तो चाहिए कि सारे गलत घोषित परिणामों को रद्द कर फिर से नए सिरे से विधिवत जाँच करें,भले ही उसमे एक माह का समय लगे.हिंदी साहित्य के विकास के लिए और इस मंच के उज्ज्वल भविष्य के लिए आप नाम की बजाय कृति पर ध्यान दीजिये.उदहारण के लिए-इस मंच पर सबसे बेहतर रचनाकार के रूप में आदरणीया सुनीता दोहरे जी हैं,वो प्रतियोगिता में भाग भी लेती हैं,लेकिन किसी प्रतियोगिता के परिणाम में विजेता के रूप में उनका नाम नहीं आता है.ये बहुत खेद की बात है.ऐसे बहुत से रचनाकार हैं,जिनकी उत्कृष्ट कृतियों के साथ न्याय नहीं हुआ है.हिंदी साहित्य सरताज की प्रतियोगिता में आप उर्दू में लिखे संस्मरण और ग़ज़लों को पुरस्कृत कर रहे हैं,इससे हिंदी भाषा का क्या भला होगा ?उर्दू और अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग हिंदी भाषा में करना एक भाषाई अशुद्धि है,चाहे आप इस सच्चाई को स्वीकार करें या न करें.सादर निवेदन.

के द्वारा:

मेरे प्रिय ब्लॉगर साथियों सप्रेम नमस्कार ये कैसी अज़ीब सी बात है कि पूरी प्रतियोगिता के दौरान हमारे आलेख पाठक की प्रतिक्रियाओं के लिए तरस जाते हैं.... कोई सुधारात्मक टिप्पणी नहीं मिल पाती और परिणाम के बाद ऐसा लगता है मानो हम सब ने अँधेरे में कुछ भी लिख दिया था.... मेरी आप सभी ब्लॉगर साथियों और पाठकों से यही विनती है कि आप प्रतिक्रिया स्वरुप सुधारात्मक टिप्पणी दें ताकि प्रत्येक ब्लॉगर अपने ब्लॉगर साथियों और पाठकों के ज्ञान से पूर्णतः लाभान्वित होते हुए लेखन को नित्य परिष्कृत कर सके.इससे हम सब को तुरंत सुधार का अवसर भी मिल जाएगा . गुन्जन जी की सुधारात्मक प्रतिक्रिया को मैं कभी नहीं भूल सकती..वे एक बहुत अच्छे कवि हैं और मेरे ब्लॉग पर कई बार अपनी सुधारात्मक टिप्पणी प्रतिक्रिया स्वरुप रख चुके हैं ..कभी-कभी तो मैं ही उन्हें अपने नए ब्लॉग की सूचना देकर आमंत्रित करती रही. इस सम्मानित मंच पर अब भी ब्लॉगर साथी एक प्रतियोगिता के दौर से गुज़र रहे हैं आप सभी अपनी सुधारात्मक टिप्पणी समय निकाल कर देते रहे ताकि परिणाम के बाद आप को कोई शिकायत ना रहे किसी भी संस्था और परिवार से जुड़ने का यही अर्थ है क्या हम अपने भाई-बहन ,पुत्र-पुत्री या परिवार के किसी अन्य सदस्य को गलती करते देखते हुए सुधार के कदम नहीं उठाते ...या उन्हें गलती करने देते हैं कि परिणाम आयेगा तब उसे एहसास दिलाएंगे ...दोस्तों ,यह तो कोई संवेदनशीलता नहीं ....क्या हमारी शिक्षा हमें यही सीखाती है ?अगर हम ब्लोग्गेर्स नन्हे शिशु हैं तो जब आग को फूल समझ कर पकड़ने लगते हैं तब आप या तो हमें नज़रंदाज़ कर देते हैं या फिर इंतज़ार करते हैं कि हाथ जल जाए फिर बता देंगे कि आग को चिमटे से पकड़ना था.....मेरे प्यारे साथियों ,हम जिस उद्देश्य से इस सम्मानित वृहद् परिवार के सदस्य बने हैं क्या हम अपने रोल निभा पा रहे हैं .....मैं तो सच में स्वयं को कभी सम्पूर्ण नहीं मानती...अपने ब्लॉग्स पर आप सबों की सुधारात्मक टिप्पणी की आस लगाए बैठी रहती हूँ हाँ हिम्मत फिर भी नहीं हारती क्योंकि इसी मंच पर कई बेहद शिष्ट ब्लॉगर साथियों के जज़बे की भी साक्षी हूँ जो बगैर किसी प्रतिक्रिया की अपेक्षा के लिखते हैं और हम उन संकलन पर अवश्य जाते हैं बहुत ही सटीक सुन्दर जानकारी मिलती है ....प्रिय साथियों, लिखना कभी नहीं छोड़ सकती क्योंकि यह मेरी जीन में है .....पिताजी से वादा किया था हर अच्छी बात को जन-जन तक पहुंचाऊंगी....मैं व्यथित हूँ ऐसा नहीं है पर जिन प्रिय सदस्यों के साथ इस परिवार में विचार और भाव साझा करती हूँ उनसे कुछ अपेक्षा रखने का हक़ भी रखती हूँ .....आप सब एक दूसरे के ब्लॉग पर सही समय पर पहुँचने की कोशिश करें और जो सुधार अपेक्षित है उससे ब्लॉगर को अवश्य परिचित कराएं ......समय बीत जाने के बाद परिणाम पर उंगली उठाना इस परिवार का ,उस विशेष ब्लॉगर का और आपका भी अपमान है क्योंकि आप भी इसी परिवार का हिस्सा हैं अगर हम सब गलत हैं तो इस गलती में आप आलोचकों की भी शत प्रतिशत जिम्मेदारी बनती है क्योंकि आप जो काम आज कर रहे हैं उसे यथा समय कर आप इस अनुपम मंच की प्रतिष्ठा पर आंच नहीं आने देते .भविष्य में इस मंच की प्रतिष्ठा की जिम्मेदारी हम सब की है इसकी प्रगति,उन्नति ,विकास में हम सब बराबर के भागीदार हैं .तो बस साथियों आज से ही जिन ब्लोग्गेर्स में आप सुधार की अपेक्षा करते हैं एक संगतराश बन कर उन्हें तराशना शुरू कर दें एक संगीतकार की तरह उसके बिखरे सुरों की पहचान कर उसे दिशानिर्देशन देना आरम्भ करें मुझे पूर्ण विश्वास है आप सब ऐसा अवश्य करेंगे वैचारिक यात्रा के प्रत्येक पड़ाव में आप सब के साथ रहूंगी ....मुझे निखारना आपका काम है. आप सब ने मुझे पढ़ा अत्यंत आभारी हूँ यमुना का प्यार भरा नमस्कार

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

प्रेम – प्रणय पुलकित मन का कोना कोना, दिल की क्यारी पुष्पित है. अधर मौन हैं लेकिन फिर भी प्रेम तुम्हारा मुखरित है. मिलन तुम्हारा सुखद मनोरम लगता मुझे कुदरती है, धड़कन भी तुम पर न्योछावर हरपल मिटती मरती है, गति तुमसे ही है साँसों की, जीवन तुम्हें समर्पित है, अधर मौन हैं लेकिन फिर भी प्रेम तुम्हारा मुखरित है. चहक उठा है सूना आँगन, महक उठी हैं दीवारें, खुशियों की भर भर भेजी हैं, बसंत ऋतु ने उपहारें, बाकी जीवन पूर्णरूप से केवल तुमको अर्पित है, अधर मौन हैं लेकिन फिर भी प्रेम तुम्हारा मुखरित है. मधुरिम प्रातः सुन्दर संध्या और सलोनी रातें हैं, भीतर मन में मिश्री घोलें मीठी मीठी बातें हैं, प्रेम तुम्हारा निर्मल पावन पाकर तनमन हर्षित है, अधर मौन हैं लेकिन फिर भी प्रेम तुम्हारा मुखरित है.

के द्वारा:

आदरणीय डॉक्टर साहब,आपने एक गम्भीर आलोचना को मखौल बनाकर उसे नजरअंदाज करने की बहुत बड़ी गलती की है.आप भविष्य में सुधर का रास्ता बंद मत कीजिये.आप कह रहे है कि ये हिंदी साहित्य सरताज नहीं केवल साहित्य सरताज प्रतियोगिता थी.आप जरा प्रतियोगिता के नियम पढ़िए.उसमे स्पष्ट लिखा है कि-भाषा: हर विधा के लिए केवल हिंदी भाषा में प्राप्त प्रविष्टियां ही मान्य होंगी और ऊपर के आलेख में पढ़िए-साहित्य में भाषा और वर्त्तनी बेहद महत्वपूर्ण होते हैं और इनकी अशुद्धियां अच्छी से अच्छी कृति को भी उपेक्षित कर सकती है.और ये भी पढ़िए-किन्तु कई रचनाएं गुणवत्ता की दृष्टि से अत्यंत उच्च कोटि की होने के बावजूद भाषागत अशुद्धियों अथवा प्रतियोगिता नियमों के किंचित सीमा तक उल्लंघन के कारण अंतिम चयन में शामिल नहीं हो पाई हैं.इससे स्पष्ट है कि ये हिंदी साहित्य सरताज प्रतियोगिता थी.आदरणीय वीनस केसरी की आलोचना पर आप कह रहे हैं कि-"… अन्य सारे कलात्मक नियम नौ-सिखियों के लिए होते हैं …सिद्धहस्त रचनाकारों के नहीं जो नए नए नियम भी बनाते व प्रस्तुत करते हैं…. "सिद्धहस्त कलाकारों को जब ग़ज़ल के तीन मूल तत्व – रदीफ़, काफिया और बह्र का ज्ञान ही नहीं है तो हम उन्हें सिद्धहस्त कैसे मान लें ?यहांपर सबसे मजेदार बात ये है कि चयन मंडली के सदस्यों को भी गज़ल विधा की मूलभूत जानकारी नहीं है.रही बात अंग्रेजी और उर्दू के शब्दों के प्रयोग तो भाषाई अशुद्धि है.इस मंच का मूलभूत उद्देश्य है-हिंदी को बढ़ावा देना और हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार करना.इसे मत भूलिए.सादर समर्पित.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

यमुना पाठक जी, मैंने सन २०११ में जागरण जन्ग्शन पर ब्लॉग बनाया था और उसी समय मंच की जरूरत समझ कर एक संक्षिप्त लेख लिखा था, कुछ मित्रों ने उस लेख को पढ़ा भी था परन्तु किसी ने उस लेख को समझ कर मेहनत करना जरूरी नहीं समझा, अन्यथा जे जे पर ऐसी भयावह स्थिति आज न होती | उस लेख का लिंक प्रस्तुत कर रहा हूँ शायद आपके किसी काम आ जाए ... http://venuskesari.jagranjunction.com/2011/05/24/%E0%A4%97%E0%A4%BC%E0%A5%9B%E0%A4%B2-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%AE%E0%A5%82%E0%A4%B2%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%A4-%E0%A4%A4%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B5-%E0%A4%87%E0%A4%B8%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%AC/ यह लेख तीन साल पुराना है आज तो नेट पर ग़ज़ल के विषय में इतनी अधिक जानकारी उपलब्ध करवाई जा चुकी है की जो सीखने की लगन रखता है वो सीख ही लेता है, आज मूलभूत जानकारियों के साथ साथ ग़ज़ल की बारीकियों पर भी विस्तार से लेख उपलब्ध करवाया जा चुका है, जरूरत है उनको खोजने पढने और समझने की केवल गूगल पर "काफिया रदीफ़ बहर" ही सर्च कर लें तो आपको दर्जनों लेख मिल जायेंगे सादर

के द्वारा:

आदरणीय संचालक महोदय जी सादर नमस्कार यमुना का अपने इस विशाल परिवार (जागरण जंक्शन )के प्रत्येक बड़ों को सादर नमस्कार ,हमउम्र साथियों को प्यार भरा नमस्कार और अनुजों को बहुत सारा प्यार और आशीर्वाद .सभी विजेता साथियों को बहुत सारी बधाई और प्रतियोगिता में शरीक होने वाले सभी ब्लोग्गेर्स को अनमोल ब्लॉग्स के लिए बहुत -बहुत धन्यवाद मुझे इस प्रतियोगिता में शरीक होकर अत्यंत खुशी मिली...बहुत कुछ सीखा और जितना सीखा उससे कई अनगिनत गुना सीखना शेष है पर यह भी महसूस किया है कि दो वर्ष पूर्व जब मंच पर प्रथम ब्लॉग लिखा था तो शून्य ही थी....आज कुछ नन्हे कदम आगे बढ़ गए हैं जिसमें इस वृहद् परिवार के आप सभी प्रिय सदस्यों का सहारा रहा है ....और सीखना और बेहतर से सर्वोत्तम पर जाना चाहती हूँ ताकि अपने लिए निर्धारित कर्त्तव्य को लेखन से भी पूरा कर सकूं ...लेखन व्यवहार परिष्करण अवश्य करता है ....ऐसा मैंने महसूस किया है...आप सब की आभारी हूँ. साभार

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

परम आदरणीय सदगुरू जी सादर नमस्कार यह अनुपम मंच वास्तव में मेरी पाठशाला ही है आपकी और वीनस केसरी जी की प्रतिक्रिया के लिए आप दोनों को धन्यवाद देती हूँ कि सुधार का एक और अवसर प्राप्त हुआ स्वयं के लिए केसरी जी की प्रतिक्रिया ((ग) यमुना पाठक (यह कैसी रूखसत है…) एक भी शेर बहर में नहीं है )...से सहमत होते हुए जानना चाहती हूँ कि बहर या अन्य मानकों के विषय में विस्तृत जानकारी देते हुए एक ब्लॉग लिख कर हमें मार्गनिर्देशन दें हम सदैव आभारी रहेंगे.....गुंजन जी ने मुझे अकविता की राह दिखाई थी मैं आज भी अनुगृहीत हूँ.आप की प्रतिक्रिया (परन्तु संस्मरण में जिसे आपने प्रथम और द्वितीय घोषित किया है.उसमे भाषाई अशुद्धि है.पहली रचना में अंग्रेजी के शब्द प्रयोग किये )के लिए एक स्पष्टीकरण देना मुनासिब समझती हूँ ....जिस वाक्य में अंग्रेज़ी शब्द प्रयुक्त हैं वह है.....शब्द 'हैंडसम 'और 'सर' संस्मरण की विषय वस्तु की प्रासंगिकता को प्रमाणिक बनाने के लिए प्रयुक्त किया गया है मैं इंग्लिश माध्यम के विद्यालय में पढ़ती थी जहां शिक्षक को 'सर' कह कर ही सम्बोधित करते थे.हिंदी साहित्य और संगीत के प्रति प्रेम इस संस्मरण में लिखी विषय वस्तु की असीम अनुकम्पा से जनित प्रेम है. "मैं उनकी प्रिय छात्रा थी...मुझे भी मंच पर बोलने का अवसर मिला...क्योंकि मेरा शुद्धता से बोलना तो उन्ही की देन थी....मैं उस वक्त कक्षा नौ में थी...बस इतना ही कहा,"सुन्दर वह है जो सुन्दर करे....handsom is as handsom does "सर सचमुच बहुत 'हैंडसम' हैं क्योंकि उन्होंने मेरी वाक्शक्ति को 'ब्यूटीफुल 'बनाया ." आपने अगर संस्मरण को ध्यान पूर्वक पढ़ा होता तो निश्चय ही ऐसी प्रतिक्रिया नहीं देते ....यह एक याद है और उन दिनों की इस एक बात को यथावत लिखा गया है जो इस संस्मरण की मांग थी अतः अंग्रेज़ी शब्द का प्रयोग यथानुसार और जान-बूझकर किया गया है यह कोई गलती से नहीं हुआ है....यादें मौलिक रूप में ही अच्छी उभरती हैं.....और वर्त्तमान में कई हिंदी शायर गीतकार को आपने सुना और पढ़ा होगा वे समयानुसार अपनी हिंदी भाषा को मिश्रित कर रहे हैं ... आशा है आप मेरी बात समझ कर मुझे प्रोत्साहित कर लेखन में सुधार का अवसर देते रहेंगे.केसरी जी के ब्लॉग की प्रतीक्षा में रहूंगी क्योंकि अनुपम मंच ने इस शानदार प्रतियोगिता का आयोजन कर ऊर्दू भाषा के शब्दों और शेरो शायरी के प्रति मेरे रूझान को बढ़ा दिया है....अगर आप इस दिशा में मुझे आगे बढ़ा सकें तो यह बहुत बड़ी बात होगी.....मैं सदैव आपकी आभारी रहूंगी आप सभी ब्लॉगर साथियों और पाठकों से यमुना बस इतना ही चाहती है ....मुझे अपने अच्छे विचार और मार्गदर्शन देते रहिये...आप सबों की तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ. साभार यमुना

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

sadguruji के द्वारा February 11, 2014 आदरणीय वीनस केसरीजी,जो आपने बातें कही हैं,वो सौ प्रतिशत सही हैं.मैं भी यही बात मंच को समझाना चाह रहा था.मैंने प्रतियोगिता में भाग लेने वाले अधिकतर लोगों को अच्छा लिखने के लिए प्रोत्साहित किया है और उन्हें अपनी शुभकामनायें दी हैं.ये उस समय का मेरा कर्त्तव्य था.संघर्ष के समय में हर व्यक्ति का साथ देना चाहिए और जब वो सफलता और सम्मान के शिखर पर पहुँच जाये तब उसे उसकी कमियां भी दिखानी चाहिए.ये एक सच्चे शुभचिंतक का धर्म है.सभी विजेताओं से मेरा अनुरोध है कि इस आलोचना को जागरण जंक्शन मंच के विकास और सुधार की दृष्टि से देंखे.मैंने सभी रचनाओं को पढ़ते हुए एक बात का विशेष ध्यान दिया कि हिंदी भाषा को इसमें कितना महत्व दिया गया है.आचार्यजी,यतीन्द्रजी,और डॉक्टर रंजना जी सहित कुछ लोगों ने इस पर विशेष ध्यान दिया है.परन्तु संस्मरण में जिसे आपने प्रथम और द्वितीय घोषित किया है.उसमे भाषाई अशुद्धि है.पहली रचना में अंग्रेजी के शब्द प्रयोग किये गए हैं और दूसरी रचना में उर्दू शब्दों की भरमार है,जो शुद्ध साहित्यिक हिंदी की दृष्टि से भाषाई अशुद्धि के अंतर्गत आती है.उसे संस्मरण कहना भी सही नहीं है.इसी तरह से अन्य लेखों में भी भाषाई त्रुटियां हैं.मेरा जागरण परिवार से अनुरोध है कि इन आलोचनाओं को मंच के विकास और सुधार की दृष्टि से देंखे.जागरण जंक्शन मंच के एक सच्चे हितैषी के रूप में जो सच कहने की हिम्मत जुटा रहे हैं,उनका हौसला बढाईये और और उनकी आलोचनाओं पर ध्यान दीजिये.मैंने आपके साहित्य सरताज प्रतियोगिता के परिणाम की केवल इसीलिए आलोचना की है कि लोग इस बारे में खुलकर चर्चा करें और इस मंच पर हिंदी साहित्य और हिंदी भाषा का और विकास हो.सादर समर्पित.

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आदरणीय वीनस केसरीजी,जो आपने बातें कही हैं,वो सौ प्रतिशत सही हैं.मैं भी यही बात मंच को समझाना चाह रहा था.मैंने प्रतियोगिता भाग लेने वाले अधिकतर लोगों को अच्छा लिखने के लिए प्रोत्साहित किया है और उन्हें अपनी शुभकामनायें दी हैं.ये उस समय का मेरा कर्त्तव्य था.संघर्ष के समय में हर व्यक्ति का साथ देना चाहिए और जब वो सफलता और सम्मान के शिखर पर पहुँच जाये तब उसे उसकी कमियां भी दिखानी चाहिए.ये एक सच्चे शुभचिंतक का धर्म है.सभी विजेताओं से मेरा अनुरोध है कि इस आलोचना को जागरण जंक्शन मंच के विकास और सुधार की दृष्टि से देंखे.मणि सभी रचनाओं को पढ़ते हुए एक बात का विशेष ध्यान दिया कि हिंदी भाषा को इसमें कितना महत्व दिया गया है.आचार्यजी,यतीन्द्रजी,और डॉक्टर रंजना जी सहित कुछ लोगों ने इस पर विशेष ध्यान दिया है.परन्तु संस्मरण में जिसे आपने प्रथम और द्वितीय घोषित किया है.उसमे भाषाई अशुद्धि है.पहली रचना में अंग्रेजी के शब्द प्रयोग किये गए हैं और दूसरी रचना में उर्दू शब्दों की भरमार है,जो शुद्ध साहित्यिक हिंदी की दृष्टि से भाषाई अशुद्धि के अंतर्गत आती है.उसे संस्मरण कहना भी सही नहीं है.इसी तरह से अन्य लेखों में भी भाषाई त्रुटियां हैं.मेरा जागरण परिवार से अनुरोध है कि इन आलोचनाओं को मंच के विकास और सुधार की दृष्टि से देंखे.जागरण जंक्शन मंच के एक सच्चे हितैषी के रूप में जो सच कहने की हिम्मत जाता रहे हैं,उनका हौसला बढाईये और और उनकी आलोचनाओं पर ध्यान दीजिये.मैंने आपके साहित्य सरताज प्रतियोगिता के परिणाम की केवल इसीलिए आलोचना की है कि लोग इस बारे में खुलकर चर्चा करें और इस मंच पर हिंदी साहित्य और हिंदी भाषा का और विकास हो.सादर समर्पित.

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साहित्य समाज में कोई प्रतियोगिता आयोजित करना और आजोजक धर्म का निर्वाह करना तलवार की धार पर चलने जैसा हुआ करता है, किसी भी स्तर पर छोटी से छोटी चूक आलोचना का कारण बन जाती है, निः संदेह जागरण समूह प्रतियोगिता के आयोजक इन खतरों से अनिभिज्ञ नहीं होंगे इसके बावजूद यदि इस विशाल स्तर पर प्रतियोगिता का आयोजन किया गया और आज आयोजन को पूर्णता प्रदान करते हुए परिणाम घोषित किया गया है जिसके लिए आयोजक साधुवाद के पात्र हैं परिणाम घोषित करते हुए लेख प्रस्तुत करते हुए बताया गया कि चयन मंडल को हर प्रकार से उन्नत रचनाएँ बहुतायत में प्राप्त हुईं जिनमें से श्रेष्ठ रचनाओं का चयन करना चयनमंडली के लिए विकट चुनौती बन गयी थी साथ ही रचनाओं के लिए और भी कई अच्छी बातें कहीं गईं, जैसे - // प्राप्त अधिकांश रचनाएं साहित्यिक दृष्टि से उच्च कोटि की कही जा सकती हैं। // \\ सभी पाठकों को मंच आश्वस्त करता है कि विजेताओं के चयन में पूर्ण पारदर्शी और निष्पक्ष रवैया अपनाया गया है // परन्तु अन्यंत दुःख और क्षोभ के साथ कहना पड़ रहा है कि आपके लेख और आपके द्वारा घोषित परिणाम के गहरा विरोधाभास है विस्तार भय से केवल "शेर ओ शायरी / गज़ल – (Sher O Shayari / Ghazal)" खंड के परिणाम पर अपना विचार प्रस्तुत कर रहा हूँ ग़ज़ल के तीन मूल तत्व होते हैं - रदीफ़, काफिया और बह्र जिसके बिना कोई रचना ग़ज़ल नहीं हो सकती,,, अब ज़रा परिणाम की और नज़र डालें - प्रथम (तीन) (क) आचार्य विजय गुंजन (मेनका श्रृंगार फिर करने लगी है) - बह्र के हवाले से पूरी ग़ज़ल बुरी तरह ख़ारिज है (ख) निर्मला सिंह गौर (एक टुकड़ा बादलों का) - ग़ज़ल रदीफ़ काफिया और बह्र तीनों का पालन करने में असमर्थ है पूरी ग़ज़ल बुरी तरह ख़ारिज है (ग) फिरदौस खान (चांदनी रात में) - ग़ज़ल का तीसरा शेर बहर से ख़ारिज है बाकी अशआर दुरुस्त हैं द्वितीय : सरोज सिंह (बचा ही लेंगें हर कश्ती को) - ग़ज़ल रदीफ़ काफिया और बह्र तीनों का पालन करने में असमर्थ है पूरी ग़ज़ल बुरी तरह ख़ारिज है तृतीय (दो) (क) वैद्य सुरेंद्रपाल (जिस मोड़ पर) - पूरी ग़ज़ल सही है बस पहले शेर और पांचवे शेर में काफिया दोष है (ख) शालिनी कौशिक (सच्चाई ये ज़माने की) ग़ज़ल काफिया और बह्र का पालन करने में असमर्थ है पूरी ग़ज़ल बुरी तरह ख़ारिज है प्रशंसित रचनाएं (क) डॉ. श्याम गुप्ता (उन के अश्कों को) कई अशआर बह्र से ख़ारिज हैं (ख) भगवान बाबू (जरा धीरे चलना) ग़ज़ल में काफिया ही नहीं है बहर भी नादारद है ... (ग) यमुना पाठक (यह कैसी रूखसत है…) एक भी शेर बहर में नहीं है अब इसके बाद यह कैसे माना जाए की आपको श्रेष्ठ रचनाएं प्राप्त हुई थीं और यदि प्राप्त हुई थीं तो आपने विधा के मानकों पर बिलकुल खरी न उतर पाने वाली रचनाओं को पुरस्कृत क्यों किया ? आपके द्वारा लेख में लिखा गया है कि - // कुछ पाठक विभिन्न आयोजनों में मंच द्वारा विजेताओं के चयन में पारदर्शिता न बरतने तथा पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने का विवाद उठाते हैं। // क्या आपने कभी जानने का प्रयास किया कि आप जिस विरोध को "विवाद" शब्द से परिभाषित कर रहे हैं उसमें तथ्यपरक बातें तो नहीं कही जा रही है, कहीं सच में तो ऐसा नहीं है कि श्रेष्ठ रचनाकारों के साथ न्याय नहीं हो पा रहा हो ... क्या आपने कभी सोचा, कहीं सच में तो ऐसा नहीं है कि दिक्कत चयन मंडली की और से हो , परिणाम प्रस्तुत करने के बाद क्या आपका कोई दायित्व नहीं है की जो विरोध हुआ उसकी पड़ताल की जाए ? चयन मंडली से जिन विधाओं में श्रेष्ठ रचनाओं का चयन, चयन मंडली द्वारा करवाया जा रहा है क्या चयन मंडली के सदस्यों को उस विधा की मूलभूत जानकारी भी है ? अगर जानकारी है तो ऐसा घटिया परिणाम कैसे हमारे सामने है ? क्या आयोजक की यह जिम्मेदारी नहीं है की चयन मंडली में ऐसे लोगों को रखे जो विधागत गहरी समझ रखते हों और उचित अनुचित के बीच का फर्क समझते हों ?????? अगर श्रेष्ठ रचनाकार इस परिणाम से हतोत्साहित होते हैं तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है ------------------------------------------------------------------------------------------- डिस्क्लेमर - इस प्रतियोगिता में मैंने हिस्सा नहीं लिया था न ही मेरा कोई संबंधी या मित्र इस प्रतियोगिता में प्रतिभागी था, आज से पहले मुझे इस प्रतियोगिता के बारे में भी कोई जानकारी नहीं थी| आज परिणाम घोषित होने की मेल पर नज़र पडी तो इधर का रुख किया और यहाँ पर जो कुछ प्रस्तुत किया गया था उसमें मौजूद गहरे विरोधाभास को देख कर यह टिप्पणी करने से खुद को रोक नहीं सका| किसी पुरस्कृत रचनाकार से मेरा कोई मनमुटाव नहीं है न ही किसी को आहात करेने का उद्देश्य है, आशा करता हूँ कि तथ्यों के साथ प्रस्तुत किये गए मेरे विचारों धैर्य के साथ मनन किया जाएगा| मैंने यह कमेन्ट इस विश्वास से लिखा है कि तथ्यों के साथ बात कही जाए तो आयोजक अपनी आलोचना सुनने की ताब रखते होंगे और तथ्यों पर विचार करके अपनी कमी को दूर करेंगे, परन्तु यदि ऐसा नहीं होता और मेरे कमेन्ट को यहाँ से हटा दिया जाता है तो मुझे सख्त अफ़सोस होगा VENUSKESARI@GMAIL.COM

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साहित्य समाज में कोई प्रतियोगिता आयोजित करना और आजोजक धर्म का निर्वाह करना तलवार की धार पर चलने जैसा हुआ करता है, किसी भी स्तर पर छोटी से छोटी चूक आलोचना का कारण बन जाती है, निः संदेह जागरण समूह प्रतियोगिता के आयोजक इन खतरों से अनिभिज्ञ नहीं होंगे  इसके बावजूद यदि इस विशाल स्तर पर प्रतियोगिता का आयोजन किया गया और आज आयोजन को पूर्णता प्रदान करते हुए परिणाम घोषित किया गया है जिसके लिए आयोजक साधुवाद  के पात्र हैं  परिणाम घोषित करते हुए लेख प्रस्तुत करते हुए बताया गया कि चयन मंडल को हर प्रकार से उन्नत रचनाएँ बहुतायत में प्राप्त हुईं जिनमें से श्रेष्ठ रचनाओं का चयन करना चयनमंडली के लिए विकट चुनौती बन गयी थी साथ ही रचनाओं के लिए और भी कई अच्छी बातें कहीं गईं, जैसे -  // प्राप्त अधिकांश रचनाएं साहित्यिक दृष्टि से उच्च कोटि की कही जा सकती हैं। // \\ सभी पाठकों को मंच आश्वस्त करता है कि विजेताओं के चयन में पूर्ण पारदर्शी और निष्पक्ष रवैया अपनाया गया है // परन्तु अन्यंत दुःख और क्षोभ के साथ कहना पड़ रहा है कि आपके लेख और आपके द्वारा घोषित परिणाम के गहरा विरोधाभास है विस्तार भय से केवल "शेर ओ शायरी / गज़ल – (Sher O Shayari / Ghazal)" खंड के परिणाम पर अपना विचार प्रस्तुत कर रहा हूँ ग़ज़ल के तीन मूल तत्व होते हैं - रदीफ़, काफिया और बह्र जिसके बिना कोई रचना ग़ज़ल नहीं हो सकती,,, अब ज़रा परिणाम की और नज़र डालें - प्रथम (तीन) (क) आचार्य विजय गुंजन (मेनका श्रृंगार फिर करने लगी है) - बह्र के हवाले से पूरी ग़ज़ल बुरी तरह ख़ारिज है (ख) निर्मला सिंह गौर (एक टुकड़ा बादलों का) - ग़ज़ल रदीफ़ काफिया और बह्र तीनों का पालन करने में असमर्थ है पूरी ग़ज़ल बुरी तरह ख़ारिज है (ग) फिरदौस खान (चांदनी रात में) - ग़ज़ल का तीसरा शेर बहर से ख़ारिज है बाकी अशआर दुरुस्त हैं द्वितीय : सरोज सिंह (बचा ही लेंगें हर कश्ती को) - ग़ज़ल रदीफ़ काफिया और बह्र तीनों का पालन करने में असमर्थ है पूरी ग़ज़ल बुरी तरह ख़ारिज है तृतीय (दो) (क) वैद्य सुरेंद्रपाल (जिस मोड़ पर) - पूरी ग़ज़ल सही है बस पहले शेर और पांचवे शेर में काफिया दोष है (ख) शालिनी कौशिक (सच्चाई ये ज़माने की) ग़ज़ल काफिया और बह्र का पालन करने में असमर्थ है पूरी ग़ज़ल बुरी तरह ख़ारिज है प्रशंसित रचनाएं (क) डॉ. श्याम गुप्ता (उन के अश्कों को) कई अशआर बह्र से ख़ारिज हैं (ख) भगवान बाबू (जरा धीरे चलना) ग़ज़ल में काफिया ही नहीं है बहर भी नादारद है ... (ग) यमुना पाठक (यह कैसी रूखसत है…) एक भी शेर बहर में नहीं है अब इसके बाद यह कैसे माना जाए की आपको श्रेष्ठ रचनाएं प्राप्त हुई थीं और यदि प्राप्त हुई थीं तो आपने विधा के मानकों पर बिलकुल खरी न उतर पाने वाली रचनाओं को पुरस्कृत क्यों किया ? आपके द्वारा लेख में लिखा गया है कि - // कुछ पाठक विभिन्न आयोजनों में मंच द्वारा विजेताओं के चयन में पारदर्शिता न बरतने तथा पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने का विवाद उठाते हैं। // क्या आपने कभी जानने का प्रयास किया कि आप जिस विरोध को "विवाद" शब्द से परिभाषित कर रहे हैं उसमें तथ्यपरक बातें तो नहीं कही जा रही है, कहीं सच में तो ऐसा नहीं है कि श्रेष्ठ रचनाकारों के साथ न्याय नहीं हो पा रहा हो ... क्या आपने कभी सोचा, कहीं सच में तो ऐसा नहीं है कि दिक्कत चयन मंडली की और से हो , परिणाम प्रस्तुत करने के बाद क्या आपका कोई दायित्व नहीं है की जो विरोध हुआ उसकी पड़ताल की जाए ? चयन मंडली से जिन विधाओं में श्रेष्ठ रचनाओं का चयन, चयन मंडली द्वारा करवाया जा रहा है क्या चयन मंडली के सदस्यों को उस विधा की मूलभूत जानकारी भी है ? अगर जानकारी है तो ऐसा घटिया परिणाम कैसे हमारे सामने है ? क्या आयोजक की यह जिम्मेदारी नहीं है की चयन मंडली में ऐसे लोगों को रखे जो विधागत गहरी समझ रखते हों और उचित अनुचित के बीच का फर्क समझते हों ?????? अगर श्रेष्ठ रचनाकार इस परिणाम से हतोत्साहित होते हैं तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है ------------------------------------------------------------------------------------------- डिस्क्लेमर - इस प्रतियोगिता में मैंने हिस्सा नहीं लिया था न ही मेरा कोई संबंधी या मित्र इस प्रतियोगिता में प्रतिभागी था, आज से पहले मुझे इस प्रतियोगिता के बारे में भी कोई जानकारी नहीं थी| आज परिणाम घोषित होने की मेल पर नज़र पडी तो इधर का रुख किया और यहाँ पर जो कुछ प्रस्तुत किया गया था उसमें मौजूद गहरे विरोधाभास को देख कर यह टिप्पणी करने से खुद को रोक नहीं सका| किसी पुरस्कृत रचनाकार से मेरा कोई मनमुटाव नहीं है न ही किसी को आहात करेने का उद्देश्य है, आशा करता हूँ कि तथ्यों के साथ प्रस्तुत किये गए मेरे विचारों धैर्य के साथ मनन किया जाएगा| मैंने यह कमेन्ट इस विश्वास से लिखा है कि तथ्यों के साथ बात कही जाए तो आयोजक अपनी आलोचना सुनने की ताब रखते होंगे और तथ्यों पर विचार करके अपनी कमी को दूर करेंगे, परन्तु यदि ऐसा नहीं होता और मेरे कमेन्ट को यहाँ से हटा दिया जाता है तो मुझे सख्त अफ़सोस होगा VENUSKESARI@GMAIL.COM

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आदरणीय जागरण जंक्शन परिवार.सादर हरिस्मरण.सबसे पहले साहित्य सरताज प्रतियोगिता के सभी विजेता एवं प्रशंसित रचनाकारों को मेरी ओर से बधाई.हजारों रचनाओं को पढ़कर अंतिम पंद्रह का चुनाव करना वास्तव में कठिन काम है.दस दिन में ये काम करना तो और भी कठिन काम है.यदि सभी हजारों रचनाएं वास्तव में पढ़ीं गईं हैं तो निश्चित रूप से आप लोग बधाई के पात्र हैं.मेरे विचार से एक व्यक्ति को कई श्रेणियों में पुरस्कृत करने की बजाय किसी एक ही साहित्यिक विधा में पुरस्कृत किया गया होता तो ज्यादा अच्छा था.इससे किसी अन्य व्यक्ति की रचना को पुरस्कृत होने का अवसर मिलता.मुझे नहीं लगता है कि आप का ये कहना पूर्णत: सही है कि-”कई अन्य रचनाएं तथ्यों और भाषा शैली में अत्यंत उच्च कोटि की होने के बावजूद भाषाई अशुद्धियों के कारण चुनाव से बाहर रखी गईं.”जिन रचनाओं को आपने पुरस्कृत किया है,उनमे से अधिकांशत: रचनाएं मैंने पढ़ीं है और कोई ऐसी रचना नहीं है जिसमे भाषाई अशुद्धि न हो.आप भाषाई अशुद्धि कह रहे हैं,जबकि लोगों ने अंग्रेजी और उर्दू के शब्द खुलकर प्रयोग किये हैं.क्या इससे बड़ी भाषाई अशुद्धि और दूसरी कोई हो सकती है ? मेरा आपलोगों से अनुरोध है कि ये वाक्य ही प्रयोग मत कीजिये कि-किन्तु कई रचनाएं गुणवत्ता की दृष्टि से अत्यंत उच्च कोटि की होने के बावजूद भाषागत अशुद्धियों के कारण अंतिम चयन में शामिल नहीं हो पाई हैं.” मैं जानना चाहूंगा कि हिंदी के साहित्य सरताज की प्रतियोगिता में उर्दू की गजलों को पुरस्कृत करना क्या भाषाई अशुद्धि नहीं है.इससे बड़ी भाषाई अशुद्धि और क्या होगी ? आपको हिंदी में गजल लिखने वालों को पुरस्कृत करना चाहिए था,इससे हिंदी भाषा का भला होता.मैंने संक्षेप में अपनी बात कही है.मैं एक दो दिन में विधिवत एक ब्लॉग लिखकर उसमे बकायदे उदाहरण देते हुए आपलोगों का ध्यान इन त्रुटियों की ओर दिलाना चाहूंगा.मुझे कुछ नहीं चाहिए.मैं केवल अपनी प्रतिक्रिया ओर सुझाव देना चाहता हूँ,जो आपने माँगा है.हो सकता है कि ये सुझाव आगे की प्रतियोगिताओ में काम आये.इस प्रतियोगिता के आयोजन के लिए जागरण जंक्शन परिवार को ओर सभी विजेताओं को मेरी ओर से हार्दिक बधाई.हार्दिक बधाई.

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आदरणीय जागरण जंक्शन परिवार.सादर हरिस्मरण.सबसे पहले साहित्य सरताज प्रतियोगिता के सभी विजेता एवं प्रशंसित रचनाकारों को मेरी ओर से बधाई.हजारों रचनाओं को पढ़कर अंतिम पंद्रह का चुनाव करना वास्तव में कठिन काम है.दस दिन में ये काम करना तो और भी कठिन काम है.यदि सभी हजारों रचनाएं वास्तव में पढ़ीं गईं हैं तो निश्चित रूप से आप लोग बधाई के पात्र हैं.मेरे विचार से एक व्यक्ति को कई श्रेणियों में पुरस्कृत करने की बजाय किसी एक ही साहित्यिक विधा में पुरस्कृत किया गया होता तो ज्यादा अच्छा था.इससे किसी अन्य व्यक्ति की रचना को पुरस्कृत होने का अवसर मिलता.मुझे नहीं लगता है की आप का ये कहना पूर्णत: सही है की-"कई अन्य रचनाएं तथ्यों और भाषा शैली में अत्यंत उच्च कोटि की होने के बावजूद भाषाई अशुद्धियों के कारण चुनाव से बाहर रखी गईं."जिन रचनाओं को आपने पुरस्कृत किया है,उनमे से अधिकांशत: रचनाएं मैंने पढ़ीं है और कोई ऐसी रचना नहीं है जिसमे भाषाई अशुद्धि न हो.आप भाषाई अशुद्धि कह रहे हैं,जबकि लोगों ने अंग्रेजी के शब्द खुलकर प्रयोग किये हैं.क्या इससे बड़ी भाषाई अशुद्धि और दूसरी कोई हो सकती है ? मेरा आपलोगों से अनुरोध है कि ये वाक्य ही प्रयोग मत कीजिये कि-किन्तु कई रचनाएं गुणवत्ता की दृष्टि से अत्यंत उच्च कोटि की होने के बावजूद भाषागत अशुद्धियों के कारण अंतिम चयन में शामिल नहीं हो पाई हैं." मैं जानना चाहूंगा कि हिंदी के साहित्य सरताज की प्रतियोगिता में उर्दू की गजलों को पुरस्कृत करना क्या भाषाई अशुद्धि नहीं है.इससे बड़ी भाषाई अशुद्धि और क्या होगी ? मैंने संक्षेप में अपनी बात कही है.मैं एक दो दिन में विधिवत एक ब्लॉग लिखकर उसमे बकायदे उदाहरण देते हुए आपलोगों का ध्यान इन त्रुटियों की ओर दिलाना चाहूंगा.मुझे कुछ नहीं चाहिए.मैं केवल अपनी प्रतिक्रिया ओर सुझाव देना चाहता हूँ,जो आपने माँगा है.हो सकता है कि ये सुझाव आगे की प्रतियोगिताओ में काम आये.इस प्रतियोगिता के आयोजन के लिए जागरण जंक्शन परिवार को ओर सभी विजेताओं को मेरी ओर से हार्दिक बधाई.हार्दिक बधाई.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

सोचू मै क्यू रूठ गये जो जान छिड़कते थे हम पे दो रूह जो अब टकराती नही थी एक अभी कुछ दिन पहले.. ये नयन जो हैं तरसा करते उन दो नयनो के दर्शन को, जो करते थे दीदार हमेशा प्रियतम का कुछ दिन पहले..... कितना कोमल स्पर्श था उन अधरो का जब, बिन माँगे मोहब्बत मिलती थी बस अभी अभी कुछ दिन पहले... ये अधर जो हैं तरसा करते उन दो अधरो के चुंबन को, वो लट जो थी उलझी रहती सुलझाने को उनकी उलझन को, स्पर्श प्रथम उन अधरो का था मिला मुझे एक उपवन मे, दिल अब भी नही भूला है उसे ना भूलेगा इस जीवन मे मन मेरा नही उनका भी यही कहता होगा मन ही मन मे फिर क्यू करते हैं दिखावा वो उस दूरी की जो है ही नही वो आज भी मेरे हैं और कल भी बस मेरे ही रहेंगे जो मेरे थे बस मेरे थे कुछ दिन पहले कुछ दिन पहले....

के द्वारा: ashutoshshukla ashutoshshukla

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के द्वारा: drshyamgupta drshyamgupta

के द्वारा: Abid ali mansoori Abid ali mansoori

के द्वारा: nyarisharma nyarisharma

हिंदी मेरा इमान है हिंदी मेरी पहचान है हिंदी हूँ मैं वतन भी मेरा प्यारा हिन्दुस्तान है *************** हिंदी की बिन्दी को मस्तक पे सजा के रखना है सर आँखो पे बिठाएँगे यह भारत माँ का गहना है ************** बढ़े चलो हिंदी की डगर हो अकेले फिर भी मगर मार्ग की काँटे भी देखना फूल बन जाएँगे पथ पर ******************** हिंदी को आगे बढ़ाना है उन्नति की राह ले जाना है केवल इक दिन ही नहीं हमने नित हिंदी दिवस मनाना है ********************** हिंदी से हिन्दुस्तान है तभी तो यह देश महान है निज भाषा की उन्नति के लिए अपना सब कुछ कुर्बान है ***************** निज भाषा का नहीं गर्व जिसे क्या प्रेम देश से होगा उसे वही वीर देश का प्यारा है हिंदी ही जिसका नारा है ******************* राष्ट्र की पहचान है जो भाषाओं में महान है जो जो सरल सहज समझी जाए उस हिंदी को सम्मान दो ************** अंग्रेजी का प्रसार भले हम अपनी भाषा भूल चले तिरस्कार माँ भाषा का जिसकी ही गोदि में हैं पले ****************** भाषा नहीं होती बुरी कोई क्यों हमने मर्यादा खोई क्यों जागृति के नाम पर हमने स्व-भाषा ही डुबोई ******************* अच्छा बहु भाषा का ज्ञान इससे ही बनते है महान सीखो जी भर भाषा अनेक पर राष्ट्र भाषा न भूलो एक ***************** इक दिन ऐसा भी आएगा हिंदी परचम लहराएगा इस राष्ट्र भाषा का हर ज्ञाता भारतवासी कहलाएगा ************** निज भाषा का ज्ञान ही उन्नति का आधार है बिन निज भाषा ज्ञान के नहीं होता सद-व्यवहार है ****************** आओ हम हिंदी अपनाएँ गैरों को परिचय करवाएँ हिंदी वैज्ञानिक भाषा है यह बात सभी को समझाएँ ******************** नहीं छोड़ो अपना मूल कभी होगी अपनी भी उन्नति तभी सच्च में ज्ञानी कहलाओगे अपनाओगे निज भाषा जभी ****************** हिंदी ही हिन्द का नारा है प्रवाहित हिंदी धारा है लाखों बाधाएँ हो फिर भी नहीं रुकना काम हमारा है *************** हम हिंदी ही अपनाएँगे इसको ऊँचा ले जाएँगे हिंदी भारत की भाषा है हम दुनिया को दिखाएँगे

के द्वारा: rani rani

मकाम सफर में थे ह्म ठहरें हवाये थी उलट कर्कस घुमड़ कर थे जरा बादल क्षितिज पर आ गए बरबस तड़ित भी राह रोके थी खड़ी हम थे बड़े बेवस हवा आइ है पूरब से अंधेरा छट गया फिर से चलो एक बार फिर से हम प्रस्थान करते है नैया को हवाओं से फिर रफ्तार देते है सफर के इस मकाम को भी अब सलाम करते है (डॉ. प्रमोद कुमार तिवारी) " मेरा नया साल " चलो नव बर्ष में कोई नई शुरुआत करते है, नई आशाओ को नैया की नई पतवार देते है, निकलकर आशियाने से हम नई राहे तलासेंगे, सफ़र में है , चलना काम , हम चलते ही जायेंगे। . तमन्ना थी मेरी एक दिन नई मंजिल को पाउँगा, सफलता पा के अपने पे, बहुत इतरा सा जाऊँगा, मगर अब हाल है दूजा, फिकर मंजिल नहीं मेरी, अब चलना चाहता हूँ रहना, जो फितरत सी है मेरी। राहों में मजा लेता हूँ , पड़े हो फूल या कांटे, शरद हो या बसंत, अब एक से लगती मुझे राते, तुम्हारी मंजिले तुमको मुबारक ओ मेरे साथी, सफ़र की लत लगी मुझको, मुझे चलना अभी बाकी। डॉ प्रमोद कुमार तिवारी "स्वार्थ " क्यों चलाते हो नफरतो की हवा, आशियाने उड़ते है हमारे भी तुम्हारे भी, जिसको समझते हो जीत अपनी , हार बनती है हमारी भी तुम्हारे भी, काम जाहिलो से करते हो, खुद को वाइज कहलाने के लिए , क्यों फेकते हो चिंगारी हमपे , घर तो जलते है हमारे भी तुम्हारे भी, बेबक्त लाते हो आँख में आँसू , हमारे जख्मो को भूल जाते हो, गाते फिरते हो मर्सिया केवल , दिल जलता है हमारा भी तुम्हारा भी, आओ मिल जुल आगे बढ़ते है , बीती बातो को भुल जाते है , रस्ते के काटो को रास्ता दिखाते है, पाव लहूलुहान होते है हमारे भी तुम्हारे भी , डॉ प्रमोद कुमार तिवारी Prem उस पल जब हम तुम मिले, तो ना तू था ना मे, केवल हवा और उसकी खुशबू, सागर और सन्नाटा था, शायद था भी नही भी, जीवन तो था पर गतिहीन,ह्रिदयस्पन्दित था पर स्वर हीन, चेतना थी पर बुधिहीन, स्पर्श भी था पर वासना-हीन, मिल गये थे हम तुम शास्वत से शायद, पर जान नही पाया कब तक, क्योंकि समय तो था पर गतिहीन............... प्रमोद कुमार तिवारी Mere bichar मॆरॆ बिचरॊ का अस्पस्ट सँसार कॊहरॆ कॆ पार का जैसा गुबार अशान्त जल मॆ मचलता प्रतिबिम्ब् अनदॆखॆ दॆश का जैसा बिम्ब धुन्ध कॆ पार नजर डालनॆ की कॊशिश जैसॆ चलती पवन कॊ पकडनॆ की चाह असफल हॊता मॆरा हर प्रयास नियति का मुझ पॆ बन उपहास चलता फिर भी इस आसय कॆ साथ निकलॆगा सूरज हॊगी रॊशनी ऎक बार छटॆगा धुन्ध स्थिर हॊगा प्रतिबिम्ब् मै बनुगा अखन्ड,स्थिर और निर्विचार प्रमॊद तिवारी मनुष्य हूँ जीना चाहता हूँ " आशाओ के जमीन पर कल के सुनहरे सपने बोता हूँ पतंगों के माफिक रौशनी के पास में उड़ता हूँ मनुष्य हूँ जीना चाहता हूँ . बीते हुए कल का फूल जो श्यामल था और भयावह भी उसी के पंखुडियो पर कल के सुनहरे रेखाक्रम खीचता हूँ मनुष्य हूँ जीना चाहता हूँ . कहते थे लोग मुझे मन तेरा खंडित और बिद्रूप है मन की ही काली सयाही से कल का राजहंस उकेरता हूँ मनुष्य हूँ जीना चाहता हूँ . चेतना मेरी लघु अज्ञान असीम है अज्ञान के ही काले साये में संभावनाओ के बीज बोता हूँ मनुष्य हूँ जीना चाहता हूँ . "प्रमोद कुमार तिवारी" Tum लक्ष्य भ्रमित था, राह कठिन था, पावं थके थे चलते चलते, राहों में तुम आन मिले तो चला दूर तक चलते चलते. . मन खाली था ह्रदय शून्य था आँखे भी पथरायी सी तेरे आने से जीवन में बाज उठी शहनाई सी. दवंद था मन में सांसे कम्पित सीने में गुबार भरा हाथो से जब हाथ मिले तो जीवन में मधुमास भरा. मन है हर्षित आँखे अश्रुत अहो भाव सा जीवन में प्रेम पथिक का साथ साथ मिला तो रंग भरा रेखाक्रम में प्रमोद कुमार तिवारी (एम. टेक)

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कविता -संतुलन  (कांटेस्ट ) निर्मला सिंह गौर  जब हवा कुछ सर चढ़ी होने लगी ,तो धरा की बेहतरी होने लगी उड़ चले बादल मरुस्थल की तरफ़ ,रेत भी थोड़ी हरी होने लगी .  कैद जब से हो गया नदिया का जल ,तो धरा पर रात में दिन हो गया बस गईं लघु सूरजों की बस्तियां ,चाँद का तेजस्व भी कम हो गया . पर्बतों की शल्य जब से हो गयी, लौह ताम्बे की खदाने खुद गयीं कारखाने खा गए खलिहान को ,रेल ,सड़कें खेत को निगल गयीं . आम के बागान जब से कट गए ,कोयलें भी बेसुरी होने लगीं तितलियों के पंख धुंदले पड़ गए ,जब गुलों की तस्करी होने लगी . दौड़ में सब लोग शामिल हो गए ,रिश्ते नाते भीड़ में सब खो गए सोते बच्चे छोड़ निकला था सुबह ,रात जब लौटा तो बच्चे सो गए . क्या तरक्की का यही अवतार है ,अविष्कारों का बड़ा आभार है प्यार कम और शौक सुबिधायें अधिक ,संतुलन भी तो यहाँ दरकार है                                                   संतुलन भी तो यहाँ दरकार है .gaurnirmalasingh.jagranjuction.com

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कविता -प्रविष्टि(ब्लॉग पोस्ट) लिंक contest-kavita-मै बदन बेचती हूँ उस औरत के तन का कतरा-कतरा फुट बहा है तभी तो चीख-चीख कहती हाँ मै बदन बेचती हूँ अपनी तपिश बुझाने को नही पेट की भूख मिटाने को नही मै बेचती हूँ बदन ,हां बेचती हूँ मै भूख से बिलखते रोते -कलपते दो नन्हे बच्चो के लिए मैं अपनी लज्जा अपनी अस्मत बेचती हूँ छाती से दूध क्या लहू का एक कतरा तक न निकला सूखे होठो के लिए आँख के आंसू भी कम पड़े तो इन अबोध बच्चो की खातिर आपने सिने को गर्म सलाखों से भेदती हूँ हाँ मै बदन बेचती हूँ ठण्ड से ठिठुरते बदन पर धोती का इक टुकड़ा भर कैसे इन बच्चो को तन से चिपका रखा देखि नही किसी ने मेरी ममता नजर पड़ी तो बस फटे कपड़ो से झांकते मेरे जिस्मो बदन पर दौड़ पड़े सब पागल कुत्तो की तरह इनके पंजो से बचने की खातिर हवसी नजरो से बदन ढंकने की खातिर मै आँखों की पानी बेचती हूँ दर्द से कराहते बच्चो की खातिर हाँ मैं बदन बेचती हूँ पर इन सफ़ेदपोशो के जैसे अपने ज़मीर नही बेचती हूँ चाँद सिक्को की खातिर अपना ईमान नही तौलती हूँ कोई चोरी पाप नही कोई जहां के भूखे भेड़ों से बचने की खातिर अपनी दौलत नीलाम करती हूँ इन मासूम बच्चो की दो रोटी की खातिर हाँ मै बदन बेचती हूँ आखिर हूँ तो एक माँ नही देख सकती बच्चो का दर्द नही सुन सकती उनकी चीत्कार उन्हें जीवन देने की खातिर खुद विषपान करती हूँ हाँ मैं बदन बेचती हूँ— —पंकज भूषण पाठक “प्रिय

के द्वारा: pankajpriyam pankajpriyam

कविता ---२५ साल पुराने ख़त http://www.jagranjunction.com/tag/%E0%A5%A8%E0%A5%AB-%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B2-%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A5%99%E0%A4%A4/ आज सुबह से व्यस्त हूँ पुरानी अलमारी में रखे खतो को संजोने में कितनी खुशबुए मेरे इर्द गिर्द सम्मोहित कर रही हैं मुझे वोह प्यार का पहला ख़त मुझे मिलने के बाद पहली ही रात को लिखा और उस दिन बजता आल इंडिया रेडियो पर गाना " कभी आर कभी पार लगा तीरे नजर" मेरे जन्मदिन पर लिखे अनेको ख़त जिसमे से सिर्फ एक पोस्ट किया था मुझे और अंत में फिर से आल इंडिया रेडियो फिर से साथ था तुम्हारे लफ्जों में "तुम जो मिल गये हो तो यह लगता हैं " वोह विवाह पूर्व का करवाचौथ और तुम्हारा ख़त अगले साल हम दोनों साथ होंगे इस दिन और तुम मेरे लिय सजोगी उस दिन और इस बार भी अंतिम लाइन आल इंडिया रेडियो के सौजन्य से " मांग के साथ तुम्हारा मैंने मांग लिया संसार " ख़त दर ख़त मैं सुनती थी गाने तुम्हारे साथ ख़त चाहे ४ दिन बाद मिलता लेकिन गाना उस वक़्त बजता मेरे जहन में आखिरी ख़त जो मुझे मिला था विवाह से ३ दिन पहले लबरेज़ था तुम्हारे प्यार से अंतहीन प्रतीक्षा से गुजरे विरह को बतलाता हुआ और तब आप का आल इंडिया रेडियो गा रहा था ' वादा करले साजना , तेरे बिना मैं न रहू मेरे बिना तू न रहे " आज भी खतो को पढ़ते हुए वही स्वर सुन रही हूँ वही धुन बज रही हैं वैसे ही थिरक रही हैं मेरी धड़कन सुनो ना २५ साल पुराने ख़त आज भी इतने ताजा से क्यों हैं —

के द्वारा: Neelima Sharma Neelima Sharma

Contest - साहित्य सरताज (लघु कथा )एक पल.. सुधा जब से किट्टी पार्टी से लौटी है तभी से चुप है। जैसे कुछ सोच रही है। हाँ , सोच तो रही है वह। आज जो बातें किट्टी में हुई। वे बातें उसे थोडा आंदोलित कर रही है। कभी -कभी वह खुद अपने आप पर ही झुंझला जाती है कि वह दूसरी औरतों की तरह बेबाक क्यूँ नहीं है। क्यूँ नहीं वह उनकी बचकानी बातों का समर्थन कर खिलखिला कर हंसती। आज तो बहुत गम्भीर विषय था तो भी बातों का स्तर कितना हल्का था। बात दामिनी को ले कर चली थी। एक वर्ष पहले जो दामिनी के साथ हादसा हुआ और किस तरह सभी के मनों को झिंझोड़ गया था। लेकिन जितना शोर मचा था वह सिर्फ मिडिया में ही था। बहुत कम लोग थे जिन्होंने दामिनी से सहानुभूति दिखाई हो। क्या उसके बाद ऐसे हादसे नहीं हुए ! सारिका के यह कहने पर कि बॉय फ्रेंड के साथ कु -समय जायेगी तो यही होगा ! सुधा से रहा नहीं गया और बोल पड़ी कि यह भी क्या बात हुई अगर वह उस समय अपनेकिसी परिजन के साथ होती तो या अगर घर में कोई बीमार हो जाता और उसे अचानक अकेली ही घर से निकलना पड़ता तो ! क्या जो कुछ उसके साथ हुआ वह जायज था। हम सभ्य समाज में रहते हैं। किसी जंगल में तो नहीं कि भेड़िया आएगा और खा जायेगा। क्या उन लोगों के अपने परिवार की कोई लड़की होती तो क्या वे सब यह करते। इस पर भी कई मतभेद उभरे। लेकिन सभी का एक मत कि देर रात ऐसे घर से निकलना नासमझी ही है। जब तक हालत सुधरते नहीं। खुद की सावधानी भी जरुरी होती है। खुद सावधान रहना चाहिए। इस बात को तो सुधा भी मानती है। वह बचपन में ही माँ से सुनती हुई आयी थी कि अपनी सावधानी से हमेशा बचाव रहता है। माँ रात को सोने से पहले घर के सारे कुंडे -चिटकनिया और परदे के पीछे हमेशा झाँक कर देखती और सावधानी का वाक्य दोहरा देती थी। जब वह होस्टल गयी तो भी माँ ने यही वाक्य दोहराया और यह भी सलाह दे डाली कि किसी से भी ज्यादा दोस्ती ना करो ना ही बैर रखो। माँ की यह सलाह उसके गाँठ बांध ली और अभी तक अमल करती है इस बात पर। तभी तो वह सभी से एक सामान व्यवहार कर पाती है। सुधा सोच रही थी कि हादसे तो कभी भी हो सकते हैं। रात का होना कोई जरुरी तो नहीं। यह तो बुरा वक्त होता है जो किसी का आना नहीं चाहिए। वक्त अगर दामिनी का खराब था तो वक्त उन दरिंदो का भी अच्छा नहीं था। तभी तो उनसे यह वारदात हुई। बुरे वक्त और अच्छे वक्त के बीच एक पल ही होता है जो इंसान पर हावी हो जाता है। ऐसा ही एक पल सुधा की जिंदगी में आया भी था। अगर वह स्वविवेक से काम न लेती तो...!इससे आगे वह सोच नहीं पाती और सिहर जाती है। हालंकि इस घटना को 26 वर्ष से भी अधिक हो चूका था लेकिन ! जब वह होस्टल में थी तब उसके ताऊ जी भी वहीँ शहर में ही रहते थे। वह अक्सर छुट्टी के दिन उनके घर चली जाया करती थी। एक बार तीन छुट्टियाँ एक साथ पड़ रही थी तो उसने ताउजी के घर जाने की सोची। वार्डन से छुट्टी की आज्ञा ले कर हॉस्टल से बाहर आ गई। रिक्शा की तलाश करने लगी। उसको भीड़ से परेशानी और घुटन होती है तो वह सिटी बस से परहेज़ ही करती थी। एक रिक्शा मिला और 7 रुपयों में तय करके बैठ गई। लेकिन उसे लगा कि रिक्शा वाला गलत रास्ते पर जा रहा है । उसे रास्ता मालूम था। उसने रिक्शे वाले को टोका भी कि वह गलत जा रहा है। वह बोला कि ये शॉर्ट -कट है। सुधा ने सोचा हो सकता है कि इसे ज्यादा मालूम है। लेकिन उसे फिर भी शक हुआ जा रहा था कि वह गलत जा रहा है। कई देर चलने के बाद वह एक पैट्रोल -पम्प के पास जा कर रुका और बोला कि शायद वह रास्ता भूल गया और पूछ कर आ रहा है। सुधा चुप कर बैठी रही। तभी कुछ आवाज़ें सुनायी दी तो उसने गरदन घुमाई। सामने यानि पैट्रोल -पम्प के पीछे की तरफ एक कमरे के आगे से दो आदमी उसको अपनी तरफ बुला रहे है। वह रिक्शे से उतरने को हुई। अचानक फिर दिमाग में एक विचार कोंध गया कि वह क्यूँ उतर रही है !कलेजा उछल कर गले में आ गया। लेकिन कस कर रिक्शा पकड़ लिया और गरदन घुमा कर बैठ गई। थोड़ी ही देर में रिक्शा वाला आकर बोला कि वह खुद जा कर रास्ता पूछ ले। सुधा का हालाँकि कलेज़ा कांप रहा था फिर भी जबड़े भींच कर लगभग डांटते हुए बोली कि रास्ता उसे पता है। वह उसे ले जायेगी। रिक्शे वाला उसके तेवर देख कर सहम गया और रिक्शे पर बैठ कर बोला तो बताओ किधर ले चलूँ। सुधा के ताऊजी पुलिस के बड़े अधिकारी थे। उसने उनका नाम लेते हुए कहाँ कि उसे पुलिस स्टेशन ले चले। वही से वह उनके घर जायेगी। जहाँ उसने जाना था वहाँ के थाने का नाम लिया। थोड़ी देर में ही वह पुलिस स्टेशन के सामने था। उसके ताऊजी पुलिस अधिकारी तो थे लेकिन वे वहाँ कार्यरत नहीं थे। अब सुधा ने कहा कि रिक्शा आगे बढ़ाये और वह घर ही जायेगी। ऊपर से मज़बूत दिखने का ढोंग करती सुधा मन ही मन बहुत डर गयी थी। घर का रास्ता ही भूल गयी। सुबह 10 बजे की हॉस्टल से निकली सुधा को डर के साथ भूख भी सताने लगी थी। दोपहर के दो बजने को आये थे। अब तो रिक्शे वाला भी चिढ़ गया था। बोला कि जब उसे घर का पता नहीं था तो वह आयी ही क्यूँ ? तभी उसे थोड़ी दूर पर ताऊजी के घर के आगे गार्ड्स दिखाई दिए। राहत की साँस सी आई और रिक्शा वही ले जाने को कह दिया। घर के आगे पहुँच कर उसने रिक्शा वाले को 7 रूपये देने चाहे तो वह रुहाँसा हो कर बोला मालूम भी है कितने घंटे हो गए हैं। सुधा बोली ,"तेरी गलती ! मैं क्या करूँ तू गलत ले कर ही क्यूँ गया ! सामने गार्ड्स दिख रहे हैं क्या ? उनको बताऊँ तेरी हरकत , मैं तो ये सात रूपये भी नहीं देने वाली थी। चल जा यहाँ से। " वह चुप करके रूपये ले कर चलता बना। सुधा का मन था कि काश आज माँ सामने होती और गले लग कर सारा डर दूर कर लेती। बाद में ताईजी को बताया तो उन्होंने कहा भी कि उसे जाने क्यूँ दिया।उसकी शिकायत करनी थी। लेकिन उसके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था और वह यह सोच ही नहीं पाई। तब ताईजी ने कहा कि जो बात हुई नहीं उस पर विचार मत करो और सोचो कि तुमने आज सात रुपयों में आधा शहर घूम लिया। दोनों हंस पड़ी इस बात पर। सोचते -सोचते वह मुस्कुरा पड़ी। यह एक पल ही होता है जो इंसान को अच्छे या बुरे वक्त में धकेल देता है। फिर भी खुद कि सावधानी जरुरी तो है ही।

के द्वारा: upasna siag upasna siag

‘साहित्य सरताज प्रतियोगिता’(संस्मरण)मेरे वेलन्टाइन मेरी गुरु महाराज मथुरा बाई... मेरे वेलन्टाइन मेरी गुरु महाराज मथुरा बाई है। मैंने जब उनको पहली बार देखा तो उनसे मुहब्बत हो गयी। .एक सीधा सादा सा चेहरा मोहरा पर असाधारण व्यक्तित्व ...! मैंने उनको पहली बार मेरी शादी के बाद देखा था जब माँ उनका आशीर्वाद दिलवाने पास के घर ले कर गयी थी। उनका प्यार से मेरे सर पर हाथ रखना मुझे अंतर्मन तक महसूस हुआ और मुझे लगा जैसे मेरे मन के तार उनसे जुड़ गए हो हालांकि मैंने उनको १० साल बाद गुरु धारण किया था पर उनसे प्यार उसी दिन हो गया था. महाराज जी का जीवन भी मुझे बहुत कारुणिक और मार्मिक लगता है। एक संपन्न परिवार में जन्मी और विवाहित मथुरा ,एक हादसे का शिकार हो कर एक टांग गवां बैठी तो पति ने त्याग दिया और मायके में रहने लगी। जहाँ उनके पति ने दूसरा विवाह कर के नई दुनिया बसा ली वहीँ मथुरा ने भी अपने ही गाँव में अपनी गुरु के माध्यम से ईश्वर से प्रीत जोड़ कर एक नई दुनिया में खो गयी। कुछ साल बाद उनके पति को संतान सुख प्राप्त नहीं हुआ तो किसी ने उसको याद करवाया कि हो सकता है ये मथुरा का श्राप हो और मैं भी मानती हूँ कि होता भी क्यूँ नहीं जिस के साथ सुख -दुःख निभाने का वादा किया था। उसको मुश्किल में अकेला छोड़ दिया। तब उनके पति को भी लगा और सपत्नीक माफ़ी मांगने आया। तब तक मथुरा हर मोह माया से मुक्त थी और उनको ना केवल माफ़ी दी और आशीर्वाद भी दिया। बाद में जब बेटा हुआ तो वह ,बेटे को भी आशीर्वाद दिलवाने लाया और कहा कि वह उनके गाँव में आ कर रहे और वह उनके लिए एक आश्रम का निर्माण भी करवा देगा पर उन्होंने मन कर दिया के जो गलियां छोड़ दी वहां पर अब बसेरा नहीं होगा। लेकिन उनके पति एक पत्नी के तो गुनहगार तो थे ही। उन्होंने एक मासूम ह्रदय को तो दुखाया ही था। अपने अंतिम समय में बहुत ही नारकीय यातना झेल कर गए है वे ...! जब मैं उसने पहली बार मिली तो उन्होंने मुझे औरतो की तीन श्रेणी समझाई कि "औरते तीन तरह की होती है " शंखिनी , हंसिनी और डंकिनी " 'हंसिनी '.. वह होती है जो कि हंसमुख तो होती ही है और हंस की तरह होती है जो मोती चुनती ही है। 'शंखिनी'... वह जो दिखावे में कुछ और होती है अंदर से कुछ और होती है और 'डंकिनी '.....वह जो हर बात में डंक सा मारती रहती है सामने वाले के गले पड़ कर बोलती है। वो बोली कि ये तुम्हें देखना है कि कैसे औरत बनना है ,तो मैंने तो हमेशा हंसिनी बनने का प्रयास ही किया है अब मुझे नहीं पता कि मैं इसमें कामयाब हुई या नहीं .............:) एक और बात जो मुझे उनकी पसंद आयी, वो कहते है नारी को अपने शरीर की सुरक्षा करनी ही चाहिए हमेशा सावधान रहना चाहिए। मैं एक बार उनके आश्रम गयी तो उन्होंने स्वयं चाय बना कर पिलाई और साथ में बिस्किट्स भी खिलाये ,अपना काम वे खुद ही करती थी। एक पैर होने के बावजूद किसी की भी सहायता नहीं लेती थी। दिन में आश्रम में रहती थी पर शाम होते ही अपने मायके के परिवार में चली जाती है। उनका मानना था कि आखिर उनका शरीर नारी का ही है तो उसकी रक्षा करनी ही होगी तभी वह घर चली जाती थी। आत्मा शुद्ध होती है उसे कोई रोग नहीं छू सकता लेकिन यह जो हमारा शरीर है इसे कर्मो के अनुसार व्याधियां झेलनी ही होती है। महाराज जी भी मधुमेह और उच्च रक्तचाप से ग्रसित थे। यही बीमारियां उनके शरीर के अंत का कारण बनी। शरीर का अंत ही होता है आत्मा का नहीं। वो आज भी हमारे आस -पास ही मौजूद है। आज-कल जहाँ ढोंगी साधू वेशधारी चहुँ ओर मिल जायेंगे वहीँ मेरी गुरु महाराज मथुरा बाई जैसे पवित्र आत्माएं भी मिलेगी जिनको अपने प्रचार कि कोई जरूरत ही नहीं हुई। ईश्वर करे हमें उनका आशीर्वाद सदैव मिलता रहे।

के द्वारा: upasna siag upasna siag

‘साहित्य सरताज प्रतियोगिता’ कविता- सलीका (प्रविष्टि) सलीका, हॉ सलीका ही तो सीखती हूं, हर रोज। अपनों और गैरों से स्कूल आते-जाते अनचाही घूरती एक्सरे सा  करती ऑखें सिखा जाती हैं सलीका। कल ही तो  पिताजी की झिडकी में  सलीका न सीखने की शिकायत और आज पहने कपडो को लेकर दादी मॉ की नसीहत सलीका, हॉ सलीका ही तो सीखती हूं, हर रोज। घर से निकलने को होने पर कभी दुपट्टा सही रखने तो कभी  सिलवटें ठीक न करने पर  भाभी- भइया की डॉट  और कभी पहनें कपडों को लेकर  पडोसियों की टिप्पणी सलीका, हॉ सलीका ही तो सीखती हूं, हर रोज। बातें ऐसे करो ऐसे चलो दौडो नहीं कूदो मत यहॉ बैठो वहॉ नहीं बंदिशों की बयार  सलीका, हॉ सलीका ही तो सीखती हूं, हर रोज।

के द्वारा: kumardineshmishra kumardineshmishra

लघु-कथा: माँफी (कन्टेस्ट) मुरारि अधिकारी रामप्रसाद की शादी सीता से हो गई थी| फिर भी गांव की लड़कियों के पीछे भागता था| उस ने रामप्रिया नाम की एक लडकी से शारीरिक सम्बन्ध किया| लड़कीवालौं ने रामप्रिया की शादी रामप्रसाद से करा दिया| सीता बौखला गई| पर शादी तो हो चुकी थी| शुरु के दिनौं में सीता ने रामप्रिया को घर का काम सिखाया| रामप्रिया ने चूपचाप काम सिखा| फिर धीरेधीरे दोनो झगड़ने लगे| रामप्रसाद ने दोनो पत्नियों को मिलाके रखने की कोशीश की| पर झगडा बढता गया| हारकर उसने दोनो को अलग कर दिया| कुछ समय बाद दोनो औरतौं के एक एक बेटे हुए| एकदिन रामप्रसाद बिमार होगया और कुछ दिनौं में मर गया| रामप्रसाद की सेवा करते हुए सीता भी बिमार पड गई| बिमारी ने उसे जीने नहीं दिया| बेटे की भविष्य की चिन्ता ने उसे मरने नहीं दिया| गांववालौं ने कहा, अपने बच्चे के बारे में निश्चिन्त हुएबिना सीता नहीं मरेगी| रामप्रिया सौत की मौत चाहती थी| इसलिए वह मिल्ने चली गई| रामप्रिया बोली, "तुम बिमार हो| इसलिए हमें पुरानी बातें भुलाकर एक दुसरे की मदत करनी चाहिए| बोलो, मैं क्या कर सकती हूँ|" सीता कष्टसाथ बोली, "देखो बहन, जबतक बेटे के बारे में तसल्ली नहीं होता, मैं नहीं मरुंगी| अगर तुम मेरे बेटे का खयाल रखने का वचन दोगी तो मैं मर जाउंगी|" "तुम्हारे बेटे की देखभाल मैं नहीं करुंगी तो कौन करेगा? बोलो, क्या करना है?" सीता ने अपने ५ वर्ष के बेटे, सीतापुत्र, को पास बुलाया और उसका हात सौत के हात में रखकर कहा, "तुम मुझे वचन दो कि तुम इसे कभी नहीं पढ़ाओगी और जब यह बडा होगा तो इसे कभी घर से बाहर नहीं निकालोगी|" "मेरा वादा है|" सीता मरगई| रामप्रिया सीतापुत्र को अपने घर लेआई| उसने सोचा, सीता उस के बेटे की भलाई चाहती थी| उस ने ठीक उल्टा किया| सीतापुत्र को पढ़ाया और बडा होने पर घर से निकाल दिया| अपने बेटे, प्रियापुत्र, को नहीं पढ़ाया और बडा होने पर घर से बाहर नहीं भेजा| घर से निकाले जाने के बाद सीतापुत्र पढने शहर चला गया| काम करते करते पढा और अच्छी नोकरी पाया| कुछ दिनौं में उस ने छुट्टी ली| ढेर सामान और पैसे लेकर गांव गया| सबकुछ रामप्रिया और प्रियापुत्र को देकर उस ने कहा, "माँ, आप कितनी अच्छी हैं| मुझे पढ़ाया| शहर भेजा| धन्यवाद|" रामप्रिया ने उसे गले लगाया| माँफी मांगा| सीतापुत्र बोला, "माँ, मुझ से नहीं, प्रियापुत्र से माँफी मागिए| उसे भी पढ़ाना और शहर भेजना चाहिए था|"

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"वो सचमुच बहुत अकेली है " हाथो की चंद लकीरे है यादो की कुछ तस्वीरे है कुछ आपस की तकरीरे है कुछ बेवस सी तकदीरे है ।।1।। झूठी सी एक कहानी है सच्ची सी एक निशानी है एक पगली बहुत दीवानी है शायद वो खुद से अनजानी है ।।2।। प्यार भरी कुछ बाते है अपनो से बढकर नाते है काली काली कुछ राते है कुछ अनमिट सी मुलाकाते है ।।3।। कुछ खुशियों के फव्वारे है कुछ मर्यादा की दीवारे है दिखावटी कुछ गुब्बारे है हम ऊनसे बहुत किनारे है ।।4।। कुछ कडिया उलझी उलझी है कुछ लडिया सुलझी सुलझी है अब भी बात नहीं समझी कैसी उसकी नासमझी है ।।5।। कष्टों को उसने झेली है झूठी सब सखी सहेली है अनबुझ सी एक पहेली है वो सचमुच बहुत अकेली है वो सचमुच बहुत अकेली है ।।6।। एक गुमनाम ग़ज़ल सी है यादो के शीश महल सी है कीचड़ के बीच कमल सी है सचमुच वो श्वेत धवल सी है ।।7।। ना जाने कैसी दुरी है मेरी भी कुछ मजबूरी है शायद वो बहुत जरुरी है बिन उसके बात न पूरी है ।।8।। बिन उसके सबकुछ खाली है जीवन संगीत भी गाली है नहीं हकीकत कुछ भी "सतर्ष " ये बाते सपनों वाली है ये बाते सपनों वाली है .............।।9।। ---सौरभ कुमार मिश्र "सतर्ष "

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"कोई विवाद नही" कसम तुम्हारी कसक चाह की, छोड़े एकपल साथ नही| खोकर ख़ुद को खुद्दार हुआ, मुझको अब कुछ भी ज्ञात नही| तुझको सबसे बाहर समझा, पर शायद तू भी अपवाद नही| अब कोई विवाद नही तुझसे, कोई फरियाद नही .........||1| बिन याद किए तुझको सजनी, बीती है कोई रात नही| पर कैसे समझेगी ये बाते, है तुझमें वो जज़्बात नही| गम में नम है नैना मेरी, जीवन में कुछ अह्लाद नही| अब कोई विवाद नही तुझसे, कोई फरियाद नही .........||2| यादों में तेरे कैद प्रिये, एकपल को भी आज़ाद नही| जिन्दा हूँ पर जीवन में मेरे, कुछ कम प्रबल आघात नही| तू मुलप्रति मेरी सजनी, किसी पुस्तक कि अनुवाद नही| अब कोई विवाद नही तुझसे, कोई फरियाद नही .........||3| तू हो जिस पहलु में सजनी, हो कोई वहा फसाद नही| रहे सादा यादों में तू, इसमे उसका कुछ हाथ नही| है सत्य-वेदना जीवन कि, कोई फिल्मी सम्वाद नही| अब कोई विवाद नही तुझसे, कोई फरियाद नही .........||4|| है सोच कि तू अन्तिम सीमा, कुछ भी अब तेरे बाद नही| तू जाम मेरे जीवन कि है, बिन तेरे कोई स्वाद नही| हर श्वास में तेरा वास प्रिये, बिन तेरे अब कोई बात नही| अब कोई विवाद नही तुझसे, कोई फरियाद नही .........||5| ल गई सारी बातें , बस तेरी कहानी याद रही| हो खुशियों कि सौगाते, अपनी कुछ और मुराद नही| आ जां घर लौट के वो सजनी, साजन आबाद नही| अब कोई विवाद नही तुझसे, कोई फरियाद नही .........||6| सौरभ कुमार मिश्र ’सतर्ष’

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"आधी आबादी" शक्ति आज है शक्तिहीन, नर दुष्कृत्यो से हुई मलीन, हालत उसकी है दीन-हीन, प्यासी जैसे जल बीच मीन, नारी को उसका असली चेहरा दिखलाने निकला हुँ। आज मै आधी आबादी का दुखडा गाने निकला हुँ।1। भ्रुण से ही विपदा है तुझपर, जन्मी तो फिर माँ बेटी पर, कहते है बेटी दुख का घर, कुँठित सदियो से तेरा स्वर, द्रौपदी को अब दुःशासन से मै मुक्त कराने निकला हुँ। आज मै आधी आबादी का दुखडा गाने निकला हुँ।2। देवी का पूजे चरण-कमल, फिर क्यो नारी का नयन सजल, सहमी सहमी सी है हरपल, समझे उसको अबला निर्बल, इन पाखण्डी पुरुषो की सच्चाई दिखलाने निकला हुँ। आज मै आधी आबादी का दुखडा गाने निकला हुँ।3। तुम वीर हो जैसे लक्ष्मीबाई, सदा ममता और त्याग ही सिखलाई, क्या धरती, क्या हिम की चोटी... अंबर मे भी परचम फहराई, नारी को उसका स्वर्णिम इतिहास बताने निकाला हू| आज मै आधी आबादी का दुखडा गाने निकला हुँ।4। कभी अबला, कभी शक्तिसार, कभी स्वर्गमयी, कभी नरकद्वार, कभी सुखसागर, कभी दुख अपार, कभी पीडिता, कभी वंदनवार, नारी को इन द्वन्दो से उन्मुक्त कराने निकला हू| आज मै आधी आबादी का दुखडा गाने निकला हुँ।5। तुम हो भगिनी, भगवती भी हो, तुम हो सीता और सती भी हो, तुम हो शक्ति, सरस्वती भी हो, तुम हो अंबर, धरती भी हो, नारी को उसका असली पहचान बताने निकला हू| आज मै आधी आबादी का दुखडा गाने निकला हुँ।6। सौरभ कुमार मिश्रा 'सतर्ष'

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आदरणीय जागरण जंक्शन परिवार,सादर हरि स्मरण.ब्लॉग शिरोमणि प्रतियोगिता के सफल आयोजन के लिए बधाई.आप लोग समय-समय पर अन्य प्रतियोगिताएं भी आयोजित करें,जिससे हिंदी लेखन को बढ़ावा मिले.मै इस बात के लिए आप लोगों का आभारी हूँ कि आप के ब्लॉग पर पढ़ते-लिखते हुए अपनी हिंदी की गलतियों में सुधार कर रहा हूँ.आदरणीय संतलाल करुण जी ने बहुत सही कहा है कि जागरण जंक्शन ब्लॉग पर लिखने कि पूरी आज़ादी है और अपने विचार व्यक्त करके आनंद और आत्मिक शांति कि अनुभूति होती है.आप लोगों से आग्रह है कि "बेस्ट ब्लॉगर आफ दी वीक" इसे हिंदी में कोई नाम दें और देवनागरी में लिखें.जैसे-"सप्ताह के सर्वश्रेष्ठ लेखक" या "सप्ताह के ब्लॉग शिरोमणि" या "सप्ताह का सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग" या "सप्ताह का ब्लॉग शिरोमणि" कर दें.मुझे उम्मीद है आप इस पर जरुर विचार करेंगे. जागरण जंक्शन ब्लॉग आने वाले ५ वर्षों में दुनिया का सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला हिंदी ब्लॉग होगा ऐसा मुझे विश्वास है.अपनी शुभकामनाओं सहित.

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ब्लॉग शिरोमणि प्रतियोगिता – अंतिम परिणाम के सभी १३ विजेताओं को बधाई.संतलाल करुण जी निश्चित रूप से "ब्लाग शिरोमणि" पद हेतु सर्वाधिक योग्य थे.मैंने समय निकलकर आप सब की रचनाएँ पढ़ीं आप सबने बहुत अच्छा लिखा है.आप सब की हिंदी बहुत अच्छी है.मुझे भी हिंदी के बारे में आप सब से बहुत सी नई जानकारी मिली और बहुत कुछ सीखने को मिला.अपनी हिंदी को और बेहतर बनाने में मुझे आप सबसे बहुत मदद मिली है.सबका लिखने का अलग-अलग अंदाज है.आप सब को बधाई.इस हिंदी प्रतियोगिता रूपी यज्ञ में अपने विचारों की आहुति डालना भी अपनेआप में एक बहुत बड़ा पुरस्कार है.जो अंतिम १३ में नहीं शामिल हो पायें हैं,वो न निराश हों और न ही इसे अहम् का मुद्दा बनायें.जो आपके विचारों के प्रशंसक हैं,आप उनके ह्रदय में बसतें हैं क्या ये अपनेआप में एक बहुत बड़ा पुरस्कार नहीं है? प्रतियोगिता के पुरस्कार निश्चित रूप से समाज में सम्मान दिलातें हैं,परन्तु इससे किसी की रोजी-रोटी नहीं चलती है.जितने का पुरस्कार विजेताओं को मिला है उससे ज्यादा तो वो अपना समय,धन,बिजली का खर्च व् इन्टरनेट का खर्च इसमें निवेश कर चुकें हैं.ये पुरस्कार एक सामाजिक सम्मान हैं,आपके परिचय का दायरा बढ़तें हैं और मन को संतुष्टि देने के साथ ही आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करतें हैं.सबसे बड़ी बात अपनी मातृभाषा को सम्मान देने की है,जो हम सबने इस प्रतियोगिता में भाग लेकर किया.अंत में जागरण परिवार को इस प्रतियोगिता के सफल आयोजन के लिए बधाई देते हुए मै आग्रह करूँगा कि दैनिक जागरण एक बहुत सम्मानित और समर्थ अख़बार है,मुझे नहीं लगता हैं की ये पुरस्कार उसकी प्रतिष्ठा के अनुरूप हैं.अत: नोकिया मोबाइल,जूसर मिक्सर ग्राइंडर और डिनर सेट की बजाय भविष्य में ऐसे बुद्धिजीविओं को नकद पुरस्कार दें.अंग्रेजी के अख़बार प्रतियोगिता में लिखने वाले बुद्धिजीविओं को सम्मानित धनराशि देते हैं.ये एक कडवी सच्चाई और बहुत अफ़सोस का विषय है कि हिंदी के अख़बार अपने लेखकों व् बुद्धिजीविओं की सेवाएँ मुफ्त में लेने के इच्छुक ज्यादा रहतें हैं.हिंदी के अख़बारों को भी अंग्रेजी के अख़बारों की तरह अपने हिंदी लेखकों व् बुद्धिजीविओं को समुचित पारिश्रमिक देना चाहिए.हिंदी का मान बढ़ाने के लिए ये जरुरी है कि हिंदी में लिखने वालों को नकद धनराशि देकर पुरस्कृत और प्रोत्साहित किया जाये.आज समाज हिंदी जैसी दुर्दशा झेल रही है,आर्थिक मामले में हिंदी के बुद्धिजीवी और लेखक भी वैसा ही दुर्दशा झेल रहे हैं.हिंदी के समर्थ अख़बार यदि तन मन धन से अपने लेखकों व् बुद्धिजीविओं का साथ दें तो इससे हिंदी का बहुत भला होगा.'भूखे पेट न भजन गोपाला' हिंदी के लेखक और बुद्धिजीवी भूखे पेट रहकर क्या हिंदी का विकास करेंगे? अपने व्यवसायिक हित के लिए हिंदी और हिंदीभाषियों का हिंदी अख़बार सिर्फ दोहन कर रहें हैं,हिंदी के विकास के लिए ये कोई सार्थक कदम नहीं उठा रहे हैं.इस दिशा में इन्हें न सिर्फ सोचना चाहिए बल्कि कुछ करना भी चाहिए.जय हिंदी.जय हिन्द.

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ब्लॉग शिरोमणि प्रतियोगिता – अंतिम परिणाम के सभी १३ विजेताओं को बधाई.संतलाल करुण जी निश्चित रूप से "ब्लाग शिरोमणि" पद हेतु सर्वाधिक योग्य थे.मैंने समय निकलकर आप सब की रचनाएँ पढ़ीं आप सबने बहुत अच्छा लिखा है.आप सब की हिंदी बहुत अच्छी है.मुझे भी हिंदी के बारे में आप सब से बहुत सी नई जानकारी मिली और बहुत कुछ सीखने को मिला.अपनी हिंदी को और बेहतर बनाने में मुझे आप सबसे बहुत मदद मिली है.सबका लिखने का अलग-अलग अंदाज है.आप सब को बधाई.इस हिंदी प्रतियोगिता रूपी यज्ञ में अपने विचारों की आहुति डालना भी अपनेआप में एक बहुत बड़ा पुरस्कार है.जो अंतिम १३ में नहीं शामिल हो पायें हैं,वो न निराश हों और न ही इसे अहम् का मुद्दा बनायें.जो आपके विचारों के प्रशंसक हैं,आप उनके ह्रदय में बसतें हैं क्या ये अपनेआप में एक बहुत बड़ा पुरस्कार नहीं है? प्रतियोगिता के पुरस्कार निश्चित रूप से समाज में सम्मान दिलातें हैं,परन्तु इससे किसी की रोजी-रोटी नहीं चलती है.जितने का पुरस्कार विजेताओं को मिला है उससे ज्यादा तो वो अपना समय,धन,बिजली का खर्च व् इन्टरनेट का खर्च इसमें निवेश कर चुकें हैं.ये पुरस्कार एक सामाजिक सम्मान हैं,आपके परिचय का दायरा बढ़तें हैं और मन को संतुष्टि देने के साथ ही आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करतें हैं.सबसे बड़ी बात अपनी मातृभाषा को सम्मान देने की है,जो हम सबने इस प्रतियोगिता में भाग लेकर किया.अंत में जागरण परिवार को इस प्रतियोगिता के सफल आयोजन के लिए बधाई देते हुए मै आग्रह करूँगा कि दैनिक जागरण एक बहुत सम्मानित और समर्थ अख़बार है,मुझे नहीं लगता हैं की ये पुरस्कार उसकी प्रतिष्ठा के अनुरूप हैं.अत: नोकिया मोबाइल और डिनर सेट की बजाय भविष्य में ऐसे बुद्धिजीविओं को नकद पुरस्कार दें.अंग्रेजी के अख़बार प्रतियोगिता में लिखने वाले बुद्धिजीविओं को सम्मानित धनराशि देते हैं.ये एक कडवी सच्चाई और बहुत अफ़सोस का विषय है कि हिंदी के अख़बार अपने लेखकों व् बुद्धिजीविओं की सेवाएँ मुफ्त में लेने के इच्छुक ज्यादा रहतें हैं.हिंदी के अख़बारों को भी अंग्रेजी के अख़बारों की तरह अपने हिंदी लेखकों व् बुद्धिजीविओं को समुचित पारिश्रमिक देना चाहिए.हिंदी का मान बढ़ाने के लिए ये जरुरी है कि हिंदी में लिखने वालों को नकद धनराशि देकर पुरस्कृत और प्रोत्साहित किया जाये.आज समाज हिंदी जैसी दुर्दशा झेल रही है,आर्थिक मामले में हिंदी के बुद्धिजीवी और लेखक भी वैसा ही दुर्दशा झेल रहे हैं.हिंदी के समर्थ अख़बार यदि तन मन धन से अपने लेखकों व् बुद्धिजीविओं का साथ दें तो इससे हिंदी का बहुत भला होगा.'भूखे पेट न भजन गोपाला' हिंदी के लेखक और बुद्धिजीवी भूखे पेट रहकर क्या हिंदी का विकास करेंगे? अपने व्यवसायिक हित के लिए हिंदी और हिंदीभाषियों का हिंदी अख़बार सिर्फ दोहन कर रहें हैं,हिंदी के विकास के लिए ये कोई सार्थक कदम नहीं उठा रहे हैं.इस दिशा में इन्हें न सिर्फ सोचना चाहिए बल्कि कुछ करना भी चाहिए.जय हिंदी.जय हिन्द.

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के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

ब्लॉग शिरोमणि प्रतियोगिता में हिस्सा लेने वाले सभी दोस्तों , चयनित सभी दोस्तों को, मेरे और पूरे जागरण जंक्शन परिवार की तरफ से बहुत बहुत शुभ कामनाएं :) हिंदी मेरे देश की हिंदी जश्न मनाओ आज इसी बात पर ये अल्फाज़ हम सबके नाम :) रंग में जब रंग मिले तब रंग नया बनता है. ढंग में जब ढंग मिले ढंग नया तब मिलता है. कोई फ़रिश्ता नहीं जमी पर , हर कोई फ़रिश्ता फिर भी है , गैरों की नहीं ये अपनी महफ़िल रहो किसी भी गाँव शहर, कोई रिश्ता फिर भी है कलम तुम्हारी कलम हमारी .... लिख जाए जो जज्बात कभी , वो अपनी है तुम्हारी है दिल से निकली बात सभी, अपना ही सब किस्सा है , अपना ये अंदाज़ है ... ये जीत तुम्हारी जीत हमारी अपना पूरा होता ख्वाब है. एक चाँद अधूरा निकला था .... आज वो पूरा आया है .... नहीं कोई ये जादू है बस शब्दों की ये माया है. ~ प्रसनीत यादव  ~

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