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Hindi Diwas Contest: ब्लॉग शिरोमणि प्रतियोगिता

Posted On: 30 Aug, 2013 Contest में

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प्रिय पाठकों,


slide-2स्वतंत्रता संग्राम का एक दौर वो भी था जब हिन्दी भाषा में ही देशभक्ति की अलख जगाई गई थी परंतु समय बीतने के साथ-साथ देश की राजभाषा हिन्दी का महत्व भी धूमिल पड़ता जा रहा है। बाजारवाद के बढ़ते आधिपत्य के बीच हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि हिन्दुस्तान के लोग ही हिन्दी से दूरी रखने लगे हैं। अंग्रेजियत को अपनाकर अपनी राजभाषा को दरकिनार करने का सिलसिला यूं तो बहुत पुराना है लेकिन पिछले कुछ समय से हालात और अधिक बिगड़ने लगे हैं क्योंकि हमारी युवा पीढ़ी को हिन्दी बोलना और हिन्दी बोलने वाले लोग ‘आउटडेटेड’ लगने लगे हैं।


पढ़े : पहले चरण् के सर्वश्रेष्ठ प्रतिभागियों की सूची देखने के लिए यहां क्लिक करें

दूसरे चरण के सर्वश्रेष्ठ प्रतिभागियों की सूची देखने के लिए यहां क्लिक करें


हिंदी के बाजारीकरण और बाजार द्वारा हिंदी की उपेक्षा के दौर में हिंदी की अस्मिता और वर्चस्व की स्थापना का प्रयास आवश्यक है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए जागरण जंक्शन मंच 14 सितंबर को मनाए जाने वाले ‘हिन्दी दिवस’ के उपलक्ष्य में एक प्रतियोगिता का आयोजन कर रहा है। इस प्रतियोगिता में जागरण जंक्शन मंच के रीडर सेक्शन के सभी सम्मानित सदस्य (जागरण प्रकाशन लिमिटेड का कोई भी सदस्य इस कॉंटेस्ट में भाग लेने के लिए अधिकृत नहीं है) भाग ले सकते हैं। आप निम्नलिखित विषयों में से कम से कम किन्हीं तीन विषयों पर अपनी लेखनी का जादू चला सकते हैं:


लेखन के लिए निर्धारित विषय:

1. “नव परिवर्तनों के दौर में हिन्दी ब्लॉगिंग”


2. ‘हिन्दी बाजार की भाषा है, गर्व की नहीं’ या ‘हिंदी गरीबों, अनपढ़ों की भाषा बनकर रह गई है’ – क्या कहना है आपका?


3. हिंदी दिवस पर ‘पखवारा’ के आयोजन का कोई औचित्य है या बस यूं ही चलता रहेगा यह सिलसिला?


4. क्या हिंदी सम्मानजनक भाषा के रूप में मुख्य धारा में लाई जा सकती है? अगर हां, तो किस प्रकार? अगर नहीं, तो क्यों नहीं?


5. हिंदी ब्लॉगिंग ‘हिंग्लिश’ स्वरूप को अपना रही है। क्या यह हिंदी के वास्तविक रंग-ढंग को बिगाड़ेगा या इससे हिंदी को व्यापक स्वीकार्यता मिलेगी?


6. हिंदी ब्लॉगिंग हिंदी को मान दिलाने में सार्थक हो सकती है या यह भी बाजार का एक हिस्सा बनकर रह जाएगी?


प्रतियोगिता के लिए नियम और शर्तें


1. प्रतियोगिता की अवधि: 1 सितंबर – 30सितंबर, 2013


2. पुरस्कार विवरण: सर्वश्रेष्ठ तेरह विजेताओं को आकर्षक पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे। इनमें से प्रथम तीन विजेता मुख्य पुरस्कार और अन्य दस विजेता प्रोत्साहन पुरस्कार के पात्र होंगे। सभी तेरह विजेताओं के ब्लॉगों को लेखक की तस्वीर के साथ एक सप्ताह के लिए मंच के मुख्य पृष्ठ पर प्रदर्शित किया जाएगा।


3. पुरस्कार श्रेणियां:


(क) ब्लॉग ‘शिरोमणि’ पुरस्कार (पुरस्कारों की संख्या – 1)

(ख) ब्लॉग ‘श्रेष्ठ’ पुरस्कार (पुरस्कारों की संख्या – 1)

(ग) ब्लॉग ‘मंजूषा’ पुरस्कार (पुरस्कारों की संख्या – 1)

(घ) ब्लॉग ‘मित्र’ पुरस्कार (पुरस्कारों की संख्या – 10)


4. अर्हता: जागरण जंक्शन रीडर सेक्शन के सभी वर्तमान सदस्य इस प्रतियोगिता के लिए पात्र हैं।


5. प्रतियोगिता की अवधि के दौरान पंजीकृत नए यूजर भी कॉंटेस्ट में शामिल हो सकते हैं।


6. प्रतियोगिता अवधि के दरमियान दिए गए विषयों की परिधि के अंतर्गत कम से कम तीन ब्लॉग पोस्ट शामिल करना अनिवार्य।


7. शब्द सीमा: प्रत्येक प्रविष्टि 400-800 शब्दों की होनी अनिवार्य है। इससे कम या अधिक शब्दों वाले लेख को प्रतियोगिता में शामिल नहीं माना जाएगा।


8. इस प्रतियोगिता में भागीदारी के लिए आप जो भी ब्लॉग प्रकाशित करें उसके शीर्षक में अपने ब्लॉग टाइटल के अलावा केवल अंग्रेजी में “Contest” अवश्य लिखें या फिर कैटेगरी के रूप में ‘contest’ का चयन करें। कॉंटेस्ट के संदर्भ में जो भी ब्लॉग पोस्ट इन दो शर्तों में से एक को भी पूरा नहीं करेगा वह प्रतियोगिता से बाहर माना जाएगा


9. इस प्रतियोगिता में भारत समेत पूरे विश्व के प्रतियोगी हिस्सा ले सकते हैं।


10. चयन पद्धति: दिए गए विषयों पर लिखित ब्लॉग पोस्टों का संपादक मंडल की अनुशंसा, अन्य ब्लॉगरों से प्राप्त सार्थक टिप्पणियों की संख्या तथा उनको मिले यूजर रेटिंग के आधार पर मूल्यांकन किया जाएगा।


11. अभद्र, अश्लील, सामुदायिक, धार्मिक भावना को आहत करने वाले तथा व्यक्तिगत टिप्पणी या लांक्षन वाले ब्लॉग पोस्टों को प्रतियोगिता के लिए अयोग्य समझा जाएगा।


12. प्रतियोगिता के संबंध में किसी भी तरह के विवादों के लिए न्यायिक क्षेत्र ‘दिल्ली’ होगा.


कॉंटेस्ट के विषय में किसी भी तरह की समस्या/स्पष्टीकरण के लिए आप feedback@jagranjunction.com पर मेल कर सकते हैं।


नोट: इस कॉंटेस्ट में शामिल होने के लिए आपको अलग से आवेदन करने की आवश्यकता नहीं। जागरण जंक्शन पर पंजीकृत रीडर सेक्शन का कोई भी यूजर इसमें भागीदारी कर सकता है।



फिर देर किस बात की ! ‘ब्लॉग शिरोमणि प्रतियोगिता’ में दर्ज़ कराएं अपनी दमदार उपस्थिति और हिंदी के प्रति प्रदर्शित करें अपनी निष्ठा!!




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55 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

भटका लड़का के द्वारा
September 30, 2013

http://theexplorer.jagranjunction.com/2013/09/21/hindi-diwas-or-hinglish/  वैसे न तो मैं कोई विशेषज्ञ हूँ और न ही आँकड़ों का जादूगर जैसा कि अपना योजना-आयोग है , पर अगर हम न चेते तो वो दिन भी दूर नहीं जब ग्रामीण अंचलों में भी ये भाषा औरंगज़ेब की तरह अपनी आखिरी साँसों के साथ अपनी गरिमा खोती जायेगी और चुपचाप खड़े होकर देखने के अलावा हमारे पास कोई रास्ता नहीं बचेगा।

HINDI BHASHA के द्वारा
September 27, 2013

सैकडों वर्षो से यह भाषा भारतीयों के विचारो को बडी सी दक्षता से व्यक्त करती रही है। हमारे पूर्वज प्रातः काल उठकर इसी भाषा में आपने ईष्ट देव का स्मरण करते है आरे स्नान करते समय गुनगुनाते थे। अपने खेतो पर जाने से पहले इसी भाषा में वह अपने पोते–पोतियों को दुलार से कुछ दैविक आशीर्वाद देते थे। हल खीच रहे बैल भी इसी भाषा में दिये गये निर्देशों को मानते थे। सायंकाल में आग से सेंकते हुए दादाजी कहानियाँ भी हिन्दी में होती थीं। इसी भाषा में दादी माँ और नानी माँ लोकगीत गाया करती थी।

#Shalini singh के द्वारा
September 26, 2013

क्या हिंदी सम्मानजनक भाषा के रूप में मुख्य धारा में लाई जा सकती है? अगर हां, तो किस प्रकार? अगर नहीं, तो क्यों नहीं? ‘कांटेस्ट’ मनुष्य अगर ठान ले तो वह क्या नहीं कर सकता है!!!…आज के ज़माने में तो इंसान की पहुँच चाँद तक हो गई है फिर धरती पर रहकर अपने ही देश के मुख्या भाषा–’हिंदी’ को प्रथम श्रेणी में क्यूँ नहीं रख सकता है??…वास्तविकता से भागने वाले लोग और दूसरों की ‘हाँ’ में ‘हाँ’ मिलाने वाले लोगों की पहली बात तो स्वयं का कोई वजूद नहीं होता..हिंदी भाषा को लोगों ने कब का पीछे छोड़ दिया है,वह तो अब बस नाम मात्र का रह गया है.विकास का अर्थ यह तो नहीं होता है की दूसरों के रंग में रंग जाएँ या जो अपनी चीज़ हो,उसे विकास के लिए बदल दें.अमेरिका में तो यह अभी तक नहीं पाया गया है की उनके दफ्तरों के कार्यों में या विद्यालयों में कहीं भी हिंदी भाषा या किसी अन्य भाषा के चलन को अपनाया गया हो.तो फिर हम ही बार-बार विकास के नाम पर मुर्ख क्यूँ बनते हैं और बिना स्वयं के राष्ट्र एवं भाषा के बारे में सोचे,फ़ौरन ‘हाँ’ कर देते हैं सारे कार्यों को.अगर इतना ही शौक है अंग्रेजी भाषा को मुख्या भाषा बनाने का तो कह दो उन पर्यटकों से की वे भारत आये तो यहाँ की भाषा,वेश-भूषा,रंग-roop,पहनावे-ओढ़ावे,चाल-ढाल को नहीं अपनाएं.गुणगान करना है तो अपनी मिटटी एवं अपने भाषा का करो.मगर सर्कार बस स्वयं के देश के बारे में गंभीर से विचार करे तो हिंदी भाषा को सम्मानजनक भाषा के रूप में मुख्या धरा में लाने के लिए कई कारवाई करा सकती है एवं कई कठोर कदम ले सकती है.मगर सर्कार ऐसा होने नहीं देगी क्यूंकि वह स्वयं दुसरे देशों का घुस खाती है और दूसरों देशों के रवैय्ये को प्रचलित कर लेती है.सर्कार चाहे तो विध्यालों एवं दफ्तरों में ‘अंग्रेजी’ पर पाबन्दी laga सकती है.अरे,स्वयं के देश की भाषा ‘हिंदी’ तो सही ढंग से आती नहीं है लोगों को और सबसे पहले वे अंग्रेजी के ही रंग में रंग जाते हैं.वह दिन दूर नहीं जब एक बार फिर से विदेशी हमारे देश में कब्ज़ा करेंगे और हम उनके गुलाम बन jaenge. देश सो रहा है और हम बस dekh रहे हैं.आखिर,कब तक प्रचलन रहेगा ऐसे सभ्यता का.अरे,विकास के होड़ में हम अपनी ही दिखावे की rangeen दुनिया में भटक चुके हैं और वास्तविकता से नाता भी तोड़ चुके हैं.भारत jaise देश को chalane वाले भी bhrasht है,उन्हें तो बस bahaana चाहिए.कोई फिक्र नहीं है..उनके हिसाब से देश तो चल ही रहा है चाहे भ्रष्टाचार से चल रहा हो या बड़े-बड़े किये गए झूटे वादों से. कोई जागरूक कराने वाला नहीं है.भाषा के प्रति न तो मोह है न ही अब कभी हो पेग.हमारी मातृभाषा लुप्त हो चुकी

    sarika के द्वारा
    September 28, 2013

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#Shalini singh के द्वारा
September 26, 2013

हिंदी दिवस पर ‘पखवारा’ के आयोजन का कोई औचित्य है या बस यूं ही चलता रहेगा यह सिलसिला? ‘कांटेस्ट’ हिंदी दिवस पर ‘पखवारा’ का आयोजन काफी हद्द तक उचित है क्यूंकि बिना रंग-मुञ्च के भारत के लोगो को कोई भी बात गंभीर नहीं लगती है या यूँ कहें की उन् मुद्दों पर उनका ध्यान केन्द्रित होता ही नहीं है,तो जिस ढंग से हम समझ सकते हैं उसी तरीके को उपयोग में लाकर कुछ सन्देश इस समाज में फैलाएं…आज के दौड़ में स्वयम को प्रगति एवं विकास के मार्ग पर ले जाने के लिए लोग खुद के धर्म तक परिवर्तित कर डालते हैं तो फिर भाषा को भूलने में इन्हें तो पल भर नही देर नहीं लग सकती है…ऐसे में अगर ‘हिंदी’ भाषा को आगे बढाने के लिए ‘पखवारे’ की ज़रूरत पड़ती है तो निः संकोच इसका आयोजन करना चाहिए.मै तो यह भी कहूँगी की सिर्फ ‘हिंदी दिवस’ पर ही क्यूँ बल्कि ऐसे भी बिना खास दिन के विद्यालयों या दफ्तरों में इस मुद्दे पर चर्चे होते रहने चाहिए.आज के पीढ़ी के बच्चे क्या-कुछ नहीं जानते हैं,मगर अगर उन्हें बचपन से हीं इस बारे में अग्रसित कराते रहे की अंग्रेजी में शिक्षा ग्रहण करना कोई बुरी बात नहीं है मगर हाँ,यह बुरी बात अवश्य होगी की वे पूर्ण रूप से हिंदी को छोड़ कोई दूसरी भाषा पर धयान केन्द्रित करें.अपने ही भाषाबोलने के लिए या उनका मान सम्मान बढाने के लिए किसी ख़ास दिन का आयोजित होना कोई बड़ी बात नहीं है.उस दिन लोग मात्र कुछ पलों के लिए ‘हिंदी’ भाषा का गुणगान करेंगे पर आगे ही पल वे वापिस अपने दिखावे की दुनिया में पुर्णतः लौट जाएँगे.सब को खुद की पड़ी है,ऐसे में कौन ध्यान देगा ‘हिंदी’ भाषा पर लोग मतलबी होते जा रहे हैं. हम मनुष्य के रूप में पैदा हुए हैं तो मनुष्यता भी होनी चाहिए. हम तो स्वयम ‘स्वतंत्रता दिवस’ जैसे दिनों पर उन् वीरों को याद करते हैं वरना बाकी के ३६४ दिन हम खुद के ही बारे में सोचते हैं. यहाँ तक की यह भी भूल जाते हैं की हम मनुष्य हैं और उतर आते हैं अपनी हैवानियत पर.’हिंदी’ भाषा अपनी पहचान खो रही है पर कोई इसके बारे में नहीं सोचता है.जब किसी अपने करीब के रिश्तेदार को कोई खोता है तो काफी दर्द होता है \,वैसे ही जब यह राष्ट्र अपनी पहचान खो रहा है तो कुछ लोगों को कष्ट अवश्य हो रहा है मगर इतने अधिक जनसँख्या वाले देश में कुछ व्यक्तियों के आवाज़ उतनाहे से बस क्रांति ही छिड़ सकती है जिसका नतीजा कुछ नहीं निकलेगा.ए देशवासियों,क्यूँ सदियों से चल रहे परम्पराओं को तुम विदेशियों के परम्पराओं से जोड़ना चाहते हो.वो अपने संस्कारों में जी रहे हैं तो फिर हम क्यूँ उनकी नक़ल करने के होड़ में है…अपनी भाषा,अपनी सभ्यता-संस्कार को ऐसे मत समाप्त करो.छोड़ दो इन् विदेशियों के चाल-ढाल एवं दिखावे को…मत अपनाओ उनके भाषाओँ एवं रंग-रूप को,स्वयम की भाषा सर्वोत्तम है..हमारी सब्सी बड़ी पहचान है..सबसे बड़ी सबूत है हिंदुस्तानी होने का…क्यूँ घिर जाते हो दुसरो के चोचों में तुम?..मनुष्य हो तो अपने भावनाओ एवं लालसा पर धैर्य रखो एवं स्वयम की परिभाषा मत भूलो…ये मत भूलो की इन् दिनों को देखने के लिए ही वीरों ने अपने प्राण दिए they….अरे,उनकी ही क़द्र कर लो…अपने देश का खाते हो और दुसरो को अपनाते हो!!!….ऐसा क्यूँ है हमारे राष्ट्र में की अपनी ही भाषा को बोलने के लिए एवं उसे कायम रखने के लिए किसी ख़ास दिन का आयोजन करना पड़ता है….ऐसे दिन का बात क्यूँ जोहते हो!….धन्यवाद….

#Shalini singh के द्वारा
September 26, 2013

‘हिन्दी बाजार की भाषा है, गर्व की नहीं’ या ‘हिंदी गरीबों, अनपढ़ों की भाषा बनकर रह गई है’ – क्या कहना है आपका? ‘कांटेस्ट’ सबसे पहले मै स्पष्ट करना चाहती हूँ की हमलोग भारतवासी होकर भी अपनी संस्कार एवं सभ्यता को अपनाने से कतरा रहे हैं तो फिर हमें कोई हक नहीं बनता है कि हम अपने आप को भारतवासी या हिंदुस्तानी कहें. युगों से बोली जा रही भारत कि ‘हिंदी’ भाषा आज लोगों को शर्मिंदगी का बोध कराती है.लोग इसे तुच्छ भाषा समझते हैं.भाषाओँ कि कोई जाति नहीं होती है.इंसान ने स्वयं को तो बाँट लिया है कई धर्मों में और अब वे भाषाओँ को भी खंडित करना चाहते हैं.’हिंदी’ भाषा बोलने में कैसी शर्मिंदगी–जहाँ हमने जन्म लिया,जिस धुल में हम पैदा हुए,उस धरती को हम अपनाने से आज झिझकते हैं. भाषाओँ के आधार पर मनुष्यों को बांटने का क्या अर्थ है? क्या गरीब के संतान अंग्रेजी नहीं बोलते? अगर ऐसा है तो मै यह बताना चाहती हूँ कि गरीब दिन-रात कठिन से कठिन परिश्रम करके,अपना पेट काटके अपने बच्चों को एक काबिल व्यक्ति बनाते है.इतनी शर्मिंदगी अगर महसूस होती है लोगों को हिंदी में वार्तालाप करने से तो पैदा होने के बाद जब वे अपने होश सँभालने लायक हो जाते हैं तो उसी पल स्वयं को मौत के घाट क्यूँ नहीं उतार लेते?कम-से-कम ‘हिंदी’ भाषा कि बदनामी तो नहीं होगी.अगर किसी भाषा या राष्ट्र कि इज्ज़त नहीं कर सकते हो तो तुम्हारा जीवित रहने या न रहने से कोई फर्क नहीं पड़ता है.स्वयं कि इज्ज़त करना लोग सर्वप्रथम उद्धेश्य मानते हैं स्वयं के लिए,उसी प्रकार अपनी भाषा कि भी इज्ज़त करनी चाहिए.उसका अछे श्रेणी में प्रचार करो,उस भाषा के महत्वा को समझो और समझाओ…न कि उनसे मुंह फेरो और उसके खिलाफ आवाज़ उठाओ.मुर्ख है वह मनुष्य जो ‘हिंदी’ भाषा को गरीबों एवं अनपढ़ों कि भाषा में देखता है.उनसे मै यह कहना चाहूंगी कि तुमने बाहरी भाषा सीखके केवल अपने हिट एवं सिर्फ स्वयं के विकास के बारे में सोचा…और जो इंसान केवल स्वयं के बारे में सोचता हो,उसे इतनी समझ हो ही कैसे सकती है कि ‘भाषा कि महत्वा’ को समझ सके या उनका मूल्याकन कर सके.मै स्वयं हमेशा ऐसे लोगो के बिच रही हूँ जो ‘हिंदी’ भाषा को नीच दृष्टि से देखते हैं परन्तु मै कभी भी स्वयं के हिट या फिर अपनी जगह बनाने के लिए अपने राष्ट्र या अपने भाषा के खिलाफ नहीं बोली बल्कि उनका महत्व समझाई जिससे कि उन्हें यह ज्ञात हुआ कि ‘हिंदी’ भाषा में कोई खराबी नहीं है बल्कि जो इस भाषा को गरीबों एवं अनपढ़ों कि भाषा समझते हैं,खराबी उनमें है कि वो स्वयं कि चीजों कि इज्ज़त नहीं करते हैं और काफी मतलबी होते हैं. सीखना है तो यह भी सीखो कि विदेह्शी लोग अपने संस्कार-सभ्यता एवं भाषा को त्याग कर ‘हिंदी’ भाषा एवम भारत के संस्कारों में रूचि रखते हैं और उन्हें ही वो अपनाते हैं..शर्म कि बात है कि हम भारतीय होने के बावजूद भी अपने आप को नहीं पहचान पाते हैं और बाहरी दिखावे कि दुनिया में भ्रमित होकर जीते रहते हैं… धन्यवाद…

anjali arora के द्वारा
September 25, 2013

rispected jagran junction i request u please tell me how i make blog ,aapne bataya ki register kerne per ho jayega lakin maine kai baar try kiya no result ……..kaise banau blog apna pura karu kaise apna sapna …..koi raah dikhata nahi or blog banana mujhe aata nahi…..din hai bahut kam mere paas soch soch dil hota udas.

ekta prakash के द्वारा
September 24, 2013

I WANT TO PARTICIPET IN THIS CONTAST BUT I DONT KNOW HOW TO MAKE A BLOG SO PLEAS HELP ME. I GIVE MY NO. 8271377877

    जागरण Contest के द्वारा
    September 25, 2013

    आदरणीय एकता प्रकाश जी, जागरण जंक्शन के इस कॉंटेस्ट में शामिल होने के लिए आपको सबसे पहले अपना ब्लॉग रजिस्टर करना होगा। इसके लिए होम पेज पर मौजूद रजिस्टर टैब पर क्लिक कीजिए तथा दिए गए निर्देशों का पालन कीजिए। आपके मेल पर एक एक्टिवेशन मेलर आएगा(इन बॉक्स और स्पैम दोनों चेक कर लें) जिसे क्लिक करने पर आपका ब्लॉग कुछ ही पलों में एक्टिव हो जाएगा। पुनः आपको दिए गए विषयों में से कम से कम तीन विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत करने होंगे। धन्यवाद जागरण जंक्शन परिवार

vinod kumar के द्वारा
September 24, 2013

राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है। राष्ट्र के गौरव का यह तकाजा है कि उसकी अपनी एक राष्ट्रभाषा हो। कोई भी देश अपनी राष्ट्रीय भावनाओं को अपनी भाषा में ही अच्छी तरह व्यक्त कर सकता है। भारत में अनेक उन्नत और समृद्ध भाषाएँ हैं किंतु हिन्दी सबसे अधिक व्यापक क्षेत्र में और सबसे अधिक लोगों द्वारा समझी जाने वाली भाषा है। हिन्दी केवल हिन्दी भाषियों की ही भाषा नहीं रही, वह तो अब भारतीय जनता के हृदय की वाणी बन गई है। सर्वोच्च सत्ता प्राप्त भारतीय संसद ने देवनागरी लिपि में लिखित हिन्दी को राजभाषा के पद पर आसीन किया है। अब यह अखिल भारत की जनता का निर्णय है। संसार में चीनी के बाद हिन्दी सबसे विशाल जनसमूह की भाषा है। प्रांतों में प्रांतीय भाषाएँ जनता तथा सरकारी कार्य का माध्यम होंगी, लेकिन केंद्रीय और अंतरप्रांतीय व्यवहार में राष्ट्रभाषा हिन्दी में ही कार्य होना आवश्यक है।

VIJAY KUMAR KALA के द्वारा
September 22, 2013

माँ तो माँ है , माँ KAHTE KIYON SARMATE हो , हम तब भी हिंदुस्तानी थे आज BHI हिंदुस्तानी हैं बतलाते कियों घबराते हो. MATRE भाषा HAMARI हिंदी केवल 14 सितम्बर KO हिंदी दिवस कियों मानते हो, PRAN करो हर रोज होगा हिंदी दिवस, ना होगी हिंदी विवस . आज यदि हम चूक गए तो. किया बतलाओगे आने वाली पीढ़ी को. किया बूल पाओगे कि हिंदी कभी हमारी रास्ट्र भाषा थी , लेकिन आज केवल इंग्लैंड और अमेरिका मई सिखाई जाती है. जय हिन्द (JSSR)

VIJAY KUMAR KALA के द्वारा
September 22, 2013

हिंदी HAMARI MATRIE BHASA HAI | HAM SABHI JANTE HAI लेकिन AAJ BHI HINDUSTAN मैं हिंदी को BOLNE AUR APNANE WALON KI KAMI NAHI HAI . लेकिन हिंदी DIWAS MANA KAR KIYA HAME AISHA MAHSOOS NAHI HOTA JAISE KEE HAM HAMARE MAA BAAP के DWARA बनाये घर मैं उनको ही GRIHA प्रवेश करवा RAHEN HAIN.ANTARRASTRIYA STAR PAR HAM KOI BHEE BHASA प्रयोग करें लेकिन जब बात RASTRA BHASA KI HO TO KEWAL AUR KEWAL हिंदी को ही प्रार्थमिकता देने के लिए BADHYA हूँ.

anjali arora के द्वारा
September 20, 2013

I WANT TO PARTICIPATE IN THIS CONTEST BUT I DONT KNOE HOW TO MAKE A BLOG PLEASE HELP ME I GIVE MY NO 9415341137

    जागरण Contest के द्वारा
    September 25, 2013

    आदरणीया अंजली जी, जागरण जंक्शन के इस कॉंटेस्ट में शामिल होने के लिए आपको सबसे पहले अपना ब्लॉग रजिस्टर करना होगा। इसके लिए होम पेज पर मौजूद रजिस्टर टैब पर क्लिक कीजिए तथा दिए गए निर्देशों का पालन कीजिए। आपके मेल पर एक एक्टिवेशन मेलर आएगा(इन बॉक्स और स्पैम दोनों चेक कर लें) जिसे क्लिक करने पर आपका ब्लॉग कुछ ही पलों में एक्टिव हो जाएगा। पुनः आपको दिए गए विषयों में से कम से कम तीन विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत करने होंगे। धन्यवाद जागरण जंक्शन परिवार

Neeru Malhotra के द्वारा
September 17, 2013

-4. क्या हिंदी सम्मानजनक भाषा के रूप में मुख्य धारा में लाई जा सकती है? अगर हां, तो किस प्रकार? अगर नहीं, तो क्यों नहीं? हिंदी सम्मानजनक भाषा के रूप में मुख्य धारा में लाई जा सकती है हिन्दी दिवस’ के उपलक्ष्य में जागरण परिवार ने हिंदी से सम्बंधित विभिन्न विषयों पर एक प्रतियोगिता का आयोजन किया है,जिसके लिए वो बधाई की पात्र है.प्रतियोगिता में लेखन का एक विषय है-‘हिन्दी बाजार की भाषा है, गर्व की नहीं’ जब पहली बार इसको मैंने पढ़ा तो मुझे बहुत दुःख हुआ.मुझे विश्वास नहीं हुआ कि पूरे विश्व का सर्वाधिक पढ़ा जाने वाला हिंदी का अख़बार हिंदी को बाज़ार की भाषा कह रहा है.आप लोगों से अपने मन की बात कहतीीहूँ कि मुझे कई दिनों तक ये बात चुभती रही और पीड़ा देती रही.मुझे ऐसा लगा जैसे हिंदी को बाज़ार की भाषा कहकर गाली दी जा रही हो.यदि कोई अंग्रेजी का अख़बार ये बात कहता तो इतना दुःख नहीं होता.कई दिनों के चिंतन के पश्चात ” हिन्दी बाजार की भाषा है, गर्व की नहीं” इसका वास्तविक अर्थ मुझे समझ में आया.भारत में लगभग ५० करोड़ से ज्यादा लोग हिंदी बोलतें हैं.हिंदी भाषी क्षेत्रों व् हिंदी भाषी जनता के जरिये बहुत सारे अख़बार,पत्रिकाएं,टीवी चैनल,दूर संचार कम्पनियां,हिंदी के वेबसाईट और फिल्म इंडस्ट्री न सिर्फ दौड़ रहीं हैं बल्कि अरबों-खरबों का व्यापार भी कर रहीं हैं.ये समर्थ लोग हिंदी के विकास के लिए कुछ नहीं करते,ये लोग हिंदी का खातें हैं.अंग्रेजी का गुण गातें हैं और हिंदी को मात्र बाज़ार की भाषा समझतें हैं. जबिक हिन्दी हमारी रास्ट्र भाषा हे , और हिन्दी हमारी पहचान भी हे कि हम हिंदुस्तानी हे हिंदी मर रही है इसे बचाना जरुरी है. अन्यथा यह केवल इतिहास बन कर रह जायगी. हिंदी को जबरदस्ती जिंदा रखा जा रहा है. इसको गलत रूप मैं पर्स्तुत किया जाता है. आज कल हिंदी भाषा रोमन भाषा बन कर रह गयी है. हिंदी समाचार पत्रों में अंग्रेजी शब्दों का खुल कर इस्तेमाल हो रहा है. हिंदी शब्दों की जगह इंग्लिश शब्दों का प्रयोग हो रहा है. उधारण के लिए प्रधान मंत्रो के जगह प्राइम मिनिस्टर संसद भवन की जगह पार्लियामेंट हाउस. इन शब्दों के प्रयोग के कारण आज कल के बच्चो को इनका मतलब हे नहीं पता. दूसरी चीज़ टेलीविज़न के चेनल पर हिंदी की बहुत बुरी दशा है. वहां पर तो मात्राओ पर ध्यान ही नहीं दिया जाता. सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को इसका ध्यान रखना चाहिये.

sadguruji के द्वारा
September 16, 2013

हिन्दी दिवस’ के उपलक्ष्य में जागरण परिवार ने हिंदी से सम्बंधित विभिन्न विषयों पर एक प्रतियोगिता का आयोजन किया है,जिसके लिए वो बधाई की पात्र है.प्रतियोगिता में लेखन का एक विषय है-‘हिन्दी बाजार की भाषा है, गर्व की नहीं’ जब पहली बार इसको मैंने पढ़ा तो मुझे बहुत दुःख हुआ.मुझे विश्वास नहीं हुआ कि पूरे विश्व का सर्वाधिक पढ़ा जाने वाला हिंदी का अख़बार हिंदी को बाज़ार की भाषा कह रहा है.आप लोगों से अपने मन की बात कहता हूँ कि मुझे कई दिनों तक ये बात चुभती रही और पीड़ा देती रही.मुझे ऐसा लगा जैसे हिंदी को बाज़ार की भाषा कहकर गाली दी जा रही हो.यदि कोई अंग्रेजी का अख़बार ये बात कहता तो इतना दुःख नहीं होता.कई दिनों के चिंतन के पश्चात ” हिन्दी बाजार की भाषा है, गर्व की नहीं” इसका वास्तविक अर्थ मुझे समझ में आया.भारत में लगभग ५० करोड़ से ज्यादा लोग हिंदी बोलतें हैं.हिंदी भाषी क्षेत्रों व् हिंदी भाषी जनता के जरिये बहुत सारे अख़बार,पत्रिकाएं,टीवी चैनल,दूर संचार कम्पनियां,हिंदी के वेबसाईट और फिल्म इंडस्ट्री न सिर्फ दौड़ रहीं हैं बल्कि अरबों-खरबों का व्यापार भी कर रहीं हैं.ये समर्थ लोग हिंदी के विकास के लिए कुछ नहीं करते,ये लोग हिंदी का खातें हैं.अंग्रेजी का गुण गातें हैं और हिंदी को मात्र बाज़ार की भाषा समझतें हैं.हिंदी दिवस पर इस सार्थक प्रतियोगिता के आयोजन के लिए हार्दिक धन्यवाद्.

BINOD KUMAR के द्वारा
September 15, 2013

Contest “fgUnh fnol ij i[kokM+k ds vk;kstu dk dksbZ vkSfpR; gS ;k cl ;w gh pyrk jgsxk ;d fly flyk vaxzsth esa fue=a.k Nkidj eq>s vkSj vkidks fgUnh fnol dk U;ksrk Hkstk tk ldrk gS] D;ksafd 14 flracj ls 28 flracj rd fgUnh i[kokM+k euk;k tkus okyk gS] gj o”kZ dh Hkkfra bl o”kZ Hkh ;g ukVd nksgjk;k tkuk gS] dze’k% o”kksZ rd nksgjk;k tkrk jgsxk D;kasfd gekjs lafo/kku dh Lohd`r jkT; Hkk”kk gSA fgUnh fnol ds vfirq] fgUnh lIrkg] fgUnh i[kokM+k] fgUnh ekg rd euk ysrs gS] xuher lef>, fgUnh ÄaVk ugha euk;k tkrkA lHkk,a gksxh fgUnh ds izxfr ij baxfy’k esa Hkk”k.k gksxsa pk; ukLrs gksxsa oxSjg oxSjg…A lkgc Hkkjr fiNM+k ns’k ugha gS vaxzsth tkurk gS ysfdu D;k vki ;g tkurs gS fdl o”kZ 14 flracj dks fgUnh dks ekU;rk fefy Fkh\ Hkwy rks eaS Hkh x;k gwWa ;kn gksrk rks ;gkWa fy[k u nsrk Qk;nk\ vkSj Hkh cgwr lh phtsa gS ;kn j[kus ds fy, pfy, fdlh ls iwN fy;k tk;xkA vkt Hkkjr ns’k fd foME+cuk,a gS fd fgUnh jkT; Hkk"kk gksrs gq, Hkh fgUnh i[kokM+k dk vk;kstu fd;k tkrk gS] bu i[kokM+ska eas fgUnh dk izpkj izlkj djus ds fy, fofHkUu rjg dk vk;kstu ;q} Lrj ij fd;k tk,xk vkSj ftlesa ljdkjh [ktkuks ls djksM+ksa :i;ksa dk Jk} dj fn;k tkrk gS A ljdkj ds }kjk gj dk;kZy; dks lwfpr fd;k tkrk gS bu i[kokM+ksa esa fgUnh ij fo’ks"k tksj fn;k tk; vkSj dk;kZy; esa Hkh fgUnh ls lacf/kr i=ks dk tcko fgUnh esa fn;k tk;A dk;kZy; ds ckgj cM+s&cM+s cSuj yxs gksrs gS fgUnh i[kokM+k dk vk;kstu 14 flracj ls 28 flracj rdA v[kckj esa yh tk;sxhA fgUnh ogha jg tk,xh tgkWa FkhA fdruh 'keZ dh ckr gS ,d Hkk"kk ds rkSj ij fgUnh dh bl gkykr ds fy, dlwjokj dkSu\ fgUnqLrku ds gh yksx fgUnh dks nj fdukkj dj jgs gS] fgUnh ls vius vki dks vyx dj jgs gSaA ysfdu ;g rks cspkjh tu&tu dh Hkk”kk gS ejrh ugha gSS vius ne ij varjkZ”Vªh; Lrj rd QSyrh tk jgh gSA fu% lansg vaxzsth cgqr le`} Hkk”kk gSA vkt yxHkx vk/kh nqfu;k esa mlh dk cksyckyk gS dscy vaxzstksa us gh ml Hkk”kk dks le`} ugha cuk;k cfYd lalkj Hkj ds leqUur ns’kksa ds iafMrks us mldks Kku izkIr djus dk loksZre lk/ku cuk fn;kA ysfdu bldk vFkZ ;g ugha fd vki viuk igpku [kks nsA euq";ksa ds ikl Hkk"kk ,slk 'kfDr’kkyh ek?;e gS] ftlus fodkl izfdz;k dks ukVdh; xfrf’kyrk iznku dh gS] Hkk”kk ds ek?;e ls fdlh O;fDr dk Kku o vuqHko mldh ekStwnxh ;k&xSj ekStwnxh esa Hkh izlkfjr fd;k tk ldrk gSA ekuo bfrgkl ds izkjafHkd nkSj esa yxHkx 60 gtkj Hkk”kk,a Fkh vc dscy N% gtkj Hkk”kk, cph gwbZ gS] yxHkx gjsd i[kokM+s esaa ,d Hkk"kk ej tkrh gS] ftldk dkj.k gS de mi;ksx] Hkk”kk,a rHkh ftohr jg ldrh gS] tcfd nSfud thou eas mls ckj&ckj cksyk tk; lkFk gh lkFk yksxksa }kjk jpukRed ys[ku dk;Z] u;s fdLls] dgkfu;kWa] dfork,sa] ukVd]xhr vkfn fy[ks tk; ftlls fgUnh Hkk”kk dk vf/kd`r :i ls fodkl gks lkFk gh izpkj izlkj ij vf/kd tksj+ fn;k tk;A flQZ fgUnh tkuus dk ugh gSa vxj vius ns’k lekt dks tkuuk gS rks fgUnh dks tkuuk t:jh gS] fgUnh dks tkus oxSj vki vius ns’k dks ugha tku ik;sxsaA fgUnh Hkk”kk gekjs lekt dk niZ.k gSA tks gekjs lkekftd laLdkjksa] ewY;ksa rFkk thou vkn’kksZ dks mtkxj djrh gSaA vr% vko’;d gS fd ge fgUnh Hkk”kk dh vfLerk o egRo dks igpkusa ,oa jk”Vªh; Lrj ij bldh xfjek dks izksRlkfgr djrs jgsaA fgUnh dks ml Lrj rd igWawpk;k tk; rkfd 14&28 flracj dk ;g fly&flyk ges’kk ds fy, lekIr gks tk;A fgUnh Hkkjr dh gh ugha cfYd bl jk”V~ª dh Hkk”kk gS] bls tu&tu rd igwWapkuk gekjk drZO;~ gh ugha tUe fl} vf/kdkj gSA D;ksafd ge lc Hkkjrh; gSA t; fgUn&t; fgUnh A

shashank dwivedi के द्वारा
September 15, 2013

hum pichade hua ish liye hai kyoki hamari padhai mother language hindi me nahi japan aage hai kyoki waha ka sara kam unki mother language me hota hai

RAJNEESH KUMAR के द्वारा
September 12, 2013

हिंदी मर रही है इसे बचाना जरुरी है. अन्यथा यह केवल इतिहास बन कर रह जायगी. हिंदी को जबरदस्ती जिंदा रखा जा रहा है. इसको गलत रूप मैं पर्स्तुत किया जाता है. आज कल हिंदी भाषा रोमन भाषा बन कर रह गयी है. हिंदी समाचार पत्रों में अंग्रेजी शब्दों का खुल कर इस्तेमाल हो रहा है. हिंदी शब्दों की जगह इंग्लिश शब्दों का प्रयोग हो रहा है. उधारण के लिए प्रधान मंत्रो के जगह प्राइम मिनिस्टर संसद भवन की जगह पार्लियामेंट हाउस. इन शब्दों के प्रयोग के कारण आज कल के बच्चो को इनका मतलब हे नहीं पता. दूसरी चीज़ टेलीविज़न के चेनल पर हिंदी की बहुत बुरी दशा है. वहां पर तो मात्राओ पर ध्यान ही नहीं दिया जाता. सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को इसका ध्यान रखना चाहिये.

Mukesh Sharma के द्वारा
September 11, 2013

हिन्दी हमारी रास्ट्र भाषा हे , और हिन्दी हमारी पहचान भी हे कि हम हिंदुस्तानी हे मुकेश शर्मा

Mohammad Ashhad Raza के द्वारा
September 11, 2013

1. “नव परिवर्तनों के दौर में हिन्दी ब्लॉगिंग” हिन्दी भारतवर्ष की सभ्यता संस्कृति.भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलनों की परिचायक है।भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी के सिवा दूसरी भाषा कदापि नहीं हो सकती है, चाहे वो अँग्रेजी ही क्यो न हो हिन्दी स्वतन्त्रता आन्दोलनों की मशाल है। हिन्दी की व्यापक अभिव्यक्ति है और इसका विस्तार केवल हिन्दी भाषी प्रान्तों में ही नहीं अपितु, अहिन्दी भाषी प्रान्तों में भी इसका वर्चस्व हैं। आज के विज्ञान, संचार, सूचना प्रौद्योगिकी और इंटरनेट के दौर में हिन्दी अपनी प्रभावी उपस्थिति के साथ कांधा से कांधा मिलाकर हिन्दी ब्लॉगर्स के साथ सहज रूप से चल रही है। नवपरिवर्तनों के दौर में इस सूचना प्रौद्योगिकी के दौर में हिन्दी में अपनी अच्छी खासी पैठ बना ली है। हिन्दी भारत की क्षेत्रीय भाषाओं और संविधान द्वारा मान्यता पात्र भाषाओं में सबसे ज्यादा हिन्दी ब्लॉगर्स में सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुई है। 2. ‘हिन्दी बाजार की भाषा है, गर्व की नहीं’ या ‘हिंदी गरीबों, अनपढ़ों की भाषा बनकर रह गई है’ – क्या कहना है आपका? उदारीकरण के बाद बाज़ार द्वारा हिन्दी को तरजीह, इस बात का सबूत है कि भारत में हिन्दी के बिना न तो संवाद चल सकता है और न ही बाज़ार। मीडिया ने भी हिन्दी की अनिवार्यता को साबित किया है। इसलिए ये कहना कि हिन्दी महज ग़रीबों और अनपढ़ों की भाषा बनकर रह गई है, बिल्कुल ग़लत है। बल्कि सच तो ये है कि हिन्दी की ज़रूरत ने अँग्रेज़ी की माला जपने वालों को भी बारहखड़ी सीखने पर मजबूर कर दिया है। पब्लिक स्कूलों में पढ़ाई के बाद मीडिया में आए तीसमार खाँ को भी अंततः हिन्दी में ही लिखना-बोलना पड़ता है। आप सिविल सेवा के ही पिछले 2-3 दशकों का इतिहास खंगालें तो पाएँगे कि हिन्दी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं को माध्यम के रूप में चुनने वालों की सफलता का प्रतिशत, अँग्रेज़ी से ज्यादा है। बल्कि हिन्दी माध्यम से सिविल सेवा में आने वालों को रोकने के लिए हाल ही में अँग्रेज़ी को अनिवार्य कर दिया गया था, जिसे बाद में वापस लेना पड़ा। हाँ, यह सच है कि बाज़ार के कारण हिन्दी, रोज़गार की सशक्त भाषा के रूप में उभरी है और इससे यह बात भी साबित हुई कि हिन्दी पर अँग्रेज़ी को वरीयता वास्तव में प्रशासनिक साजिश है। हाँ, यह सच है कि बाज़ार के कारण हिन्दी, रोज़गार की सशक्त भाषा के रूप में उभरी है और इससे यह बात भी साबित हुई कि हिन्दी पर अँग्रेज़ी को वरीयता वास्तव में प्रशासनिक साजिश है। हिन्दी सिर्फ़ ग़रीबों और गंवारों की भाषा नहीं, हमारी मातृ-भाषा है। रही गर्व की बात तो गर्व की नहीं, अपनी भाषा से प्रेम की ज़रूरत है। 3. हिंदी दिवस पर ‘पखवारा’ के आयोजन का कोई औचित्य है या बस यूं ही चलता रहेगा यह सिलसिला? हर साल 14 सितम्बर को ‘हिन्दी दिवस’ को मनाए जाने की रस्म है और अंग्रेजी के इस युग में हिन्दी दिवस महज रस्म अदायगी बनकर रह गया है। अंग्रेजी इस कदर हावी है कि इससे अनजान लोगों को दूसरी नजरों से देखा जाता है। आजादी के 66 साल बीतने के बाद भी हिन्दी राष्ट्रभाषा का वह दर्जा हासिल करने में नाकाम रही है, जिसकी वकालत देश को चलाने वाले करते आए हैं।भारत में प्रतिवर्ष 14 सितम्बर का दिन ‘हिन्दी-दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इस दिन विभिन्न शासकीय-अशासकीय कार्यालयों, शिक्षा संस्थाओं आदि में विविध गोष्ठियों, सम्मेलनों, प्रतियोगिताओं तथा अन्य कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। कहीं-कहीं ‘हिन्दी पखवाडा’ तथा ‘राष्ट्रभाषा सप्ताह’ इत्यादि भी मनाये जाते हैंपरन्तु,वैज्ञानिक शोध इस बात को सिद्ध कर चुके हैं की बच्चों के मस्तिष्क, बुद्धि एवं तर्क शक्ति के सहज एवं संपूर्ण विकास के लिए मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करना ही सर्वाधिक सहायक हैपरन्तु,वैज्ञानिक शोध इस बात को सिद्ध कर चुके हैं की बच्चों के मस्तिष्क, बुद्धि एवं तर्क शक्ति के सहज एवं संपूर्ण विकास के लिए मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करना ही सर्वाधिक सहायक हैहम सभी को भी और कहीं से भी हिंदी में बातचीत या कार्य करने पर खुद को कमजोर मानने की जरुरत नहीं है।बल्कि गर्व से हिंदी में बातचीत करें और हिंदी को मात्र एक दिवस की रस्म अदायगी न बनने दें ।हर दिवस को हिंदी दिवस समझें तभी हिंदी की महिमा और गरिमा बढ़ेगी।

Parul Tripathi के द्वारा
September 10, 2013

बचा रहे इस देह में,स्वाभिमान का अंश। रखो बचाकर इसलिए,हिन्दी भाषा का वंश।। कथा,कहानी,लेरियाँ,थपकी लाड-दुलार। हिन्दी भाषा के सिवा,और कहाँ ये प्यार।। हिन्दी से जिसको मिला,पद पैसा सम्मान। हिन्दी उनके ही लिए,मस्ती का सामान।। सम्मेलन,संगोष्ठियों,पुरस्कार,पदमान। हिन्दी के हिस्से यही धोखे,दर्द तमाम।। हिन्दी की उँगली पकड,जो पहुँचे दरबार। हिन्दी को ही नोचते,बनकर वे सरकार।। अंग्रेजी पर गर्व क्यों,हिन्दी पर क्यों शर्म।। सोचो इसके मायने,सोचो इसका मर्म। दफ्तर से दरबार तक,खून सभी का सर्द। अब पारुल किससे कहे,हिन्दी अपना दर्द।।

Parul Tripathi के द्वारा
September 10, 2013

बचा रहे इस देह में,स्वाभिमान का अंश। रखो बचाकर इसलिए,हिन्दी भाषा का वंश।। कथा,कहानी,लेरियाँ,थपकी लाड-दुलार। हिन्दी भाषा के सिवा,और कहाँ ये प्यार।। हिन्दी से जिसको मिला,पद पैसा सम्मान। हिन्दी उनके ही लिए,मस्ती का सामान।। सम्मेलन,संगोष्ठियों,पुरस्कार,पदमान। हिन्दी के हिस्से यही धोखे,दर्द तमाम।। हिन्दी की उँगली पकड,जो पहुँचे दरबार। हिन्दी को ही नोचते,बनकर वे सरकार।। अंग्रेजी पर गर्व क्यों,हिन्दी पर क्यों शर्म।। सोचो इसके मायने,सोचो इसका मर्म। दफ्तर से दरबार तक,खून सभी का सर्द। अब पारुल किससे कहे,हिन्दी अपना दर्द।।

swamishishuvidehananda sarswti tiwarimaharaj karanjalad datt.maharashtra. के द्वारा
September 10, 2013

mhoday_hamne_apna_blog”nam”om h2o nmah”rajistar..karaya..thha..bad..me..jab..use..kholne..gaye..to..’vah’nhi..khula…”ab”yah”bataiye_ki_apki_kitni_nishtha_hai_”ri”da”r’’s”me”aur”unke”prti”’aise..vyvhar..me?

Pritam Kumar Raw के द्वारा
September 10, 2013

महान राष्ट्रबादी,राष्ट्रभाषा के सच्चे समर्थ महात्मा गाँधी रचित ’अँग्रेजी मोह से बड़ी मूर्खता कोई नहीं ‘ शीर्षक निबंध में निबंधकार के व्यक्त विचारो से स्पष्ट हो जाता है की भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी के सिवा दूसरी भाषा कदापि नहीं हो सकती है, चाहे वो अँग्रेजी ही क्यो न हो। वस्तुतः हिन्दी बहुत सरल, सरस एवं बोधगम्य भाषा है, जिसे हम माता की गोद में प्रारंभ कर जीवनपर्यंत आसानी से बोलते, पढ़ते एवं अपनी आंतरिक भावना को प्रकट करते हैं। इसी अत्यंत सुबोध भाषा के माध्यम से विरासत मे सभ्यता एवं संस्कृति का समुचित ज्ञान प्राप्त कर पाते हैं। ठीक इसके विपरीत अँग्रेजी बच्चों पर ऊपर से अनावश्यक रूप से लादी जाती है, जो एक जटिल और दुरूह भाषा है। अँग्रेजी सीखने के लिए कठिन मेहनत करने के पश्चात भी इसे हम आत्मसात नहीं कर पाते। अँग्रेजी में प्रेम, वात्सल्य एवं भक्ति भाव को प्रकट नहीं कर सकते है, क्योकि ये हृदय के भाव होते है और अँग्रेजी का संबंध हमारे हृदय से नहीं होता। हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी मे पाचन क्षमता शक्ति अधिक है। इसमे मिलने और मिलाने की क्षमता अँग्रेजी से ज्यादा है। हिन्दी हमारे हृदय में राष्ट्रभक्ति को पल्लवित एवं पुष्पित करती है। हमारी हिन्दी में संगठन की क्षमता है यह सम्पूर्ण वांड़्गमय को एकता के सूत्र मे बाँधकर आत्म गौरव का भाव भरती है। अँग्रेजी के अच्छे से अच्छे विद्वान जब सुख या दुख मे अधिक संवेदनशील होते है तो उनके अधरों से अँग्रेजी छूमंतर की तरह गायब हो जाती है और वे अपनी संवेदना को अपनी मातृभाषा मे ही व्यक्त करने के लिय बाध्य हो जाते हैं, जैसे – हे राम !, कष्ट होने पर बाप रे !, ऐसी स्थिति मे हिन्दी ही हमारी आत्मभाव को प्रगट करने में सक्षम होती है। अतः इन सभी बातों से स्पष्ट होती है की भारत की राष्ट्रभाषा अँग्रेजी कदापि नहीं हो सकती है। इसके अतिरिक्त उच्चारण के द्वारा शब्द का अंतर स्पष्ट करने की जो क्षमता हिन्दी में है वो अँग्रेजी में नहीं। हिन्दी का भंडार विपुल है। किसी भी देश की उन्नति वहाँ की एक राष्ट्रभाषा से ही संभव है। अतः स्पष्ट कहा जा सकता है की हिन्दी भाषा को ही राष्ट्रभाषा के पद पर आसीन होने का गौरव प्राप्त है। इसके उत्थान से ही देश का नवोत्थान हो सकता है।

Pritam Kumar Raw के द्वारा
September 9, 2013

महान राष्ट्रबादी,राष्ट्रभाषा के सच्चे समथॆ महात्मा गाँधी रचित ’अँग्रेजी मोह से बड़ी मूर्खता कोई नहीं ‘ शीर्षक निबंध मे निबंधकार के व्यक्त विचारो से स्पष्ट हो जाता है की भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी के सिवा दूसरी भाषा कदापि नहीं हो सकती है, चाहे वो अँग्रेजी ही क्यो न हो। वस्तुतः हिन्दी बहुत सरल, सरस एवं बोधगम्य भाषा है, जिसे हम माता की गोद मे प्रारंभ केर जीवनपर्यंत आसानी दे बोलते, पढ़ते एवं अपनी आंतरिक भावना को प्रकट करते हैं। इसी अत्यंत सुबोध भाषा के माध्यम से विरासत मे सभ्यता एवं संस्कृति का समुचित ज्ञान प्राप्त कर पाते हैं । ठीक इसके विपरीत अँग्रेजी बच्चों पर ऊपर से अनावश्यक रूप से लादी जाती है, जो एक जटिल और दुरूह भाषा है। अँग्रेजी सीखने के लिए कठिन मेहनत करने के पश्चात भी इसे हम आत्मसात नहीं कर पाते। अँग्रेजी मे प्रेम, वात्सल्य एवं भक्ति भाव को प्रकट नहीं कर सकते है, क्योकि ये हृदय के भाव होते है और अँग्रेजी का संबंध हमारे हृदय से नहीं होता।                                                                हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी मे पाचन क्षमता शक्ति अधिक है। इसमे मिलने और मिलाने की क्षमता अँग्रेजी से ज्यादा है। हिन्दी हमारे हृदय मे राष्ट्रभक्ति को पल्लवित एवं पुष्पित करती है। हमारी हिन्दी मे संगठन की क्षमता है यह सम्पूर्ण वांड़्गमय को एकता के सूत्र मे बाँधकर आत्म गौरव का भाव भरती है। अँग्रेजी के अच्छे से अच्छे विद्वान जब सुख या दुख मे अधिक संवेदनशील होते है तो उनके अधरों से अँग्रेजी छूमंतर की तरह गायब हो जाती है और वे अपनी संवेदना को अपनी मातृभाषा मे ही व्यक्त करने के लिय बाध्य हो जाते हैं, जैसे - हे राम !, कष्ट होने पर बाप रे, ऐसी स्थिति मे हिन्दी ही हमारी आत्मभाव को प्रगट करने मे सक्षम होती है।       अतः इन सबै बातों से स्पष्ट होती है की भारत की राष्ट्रभाषा अँग्रेजी कदापि नहीं हो सकती है। इसके अतिरिक्त उच्चारण के द्वारा शब्द का अंतर स्पष्ट करने की जो क्षमता हिन्दी मे है वो अँग्रेजी मे नहीं। हिन्दी का भंडार विपुल है। किसी भी देश की उन्नति वहाँ की एक राष्ट्रभाषा से ही संभव है। अतः स्पष्ट कहा जा सकता है की हिन्दी भाषा को ही राष्ट्रभाषा के पद पर आसीन होने का गौरव प्राप्त है। इसके उत्थान से ही देश का नवोत्थान हो सकता है।

kailash के द्वारा
September 9, 2013

हिंदी बाज़ार की भाषा नहीं है ! अगर हम लोग सब इंग्लिश का प्रयोग बंद कर दे ,तो हिंदी का स्वरूप अपने आप बदल जायेगा ! आज के युग मैं हिंदी केवल गरीबो और अनपढ़ों की भाषा बन गयी हैं ,आज हिंदी बोलने वालों को तुच्छ समझा जाता हैं जबकि हमें हमेशा इस बात का ध्यान रखना चहिये “हिंदी मैं काम भारतियों की शान “आज तो विद्यालय मैं भी हिंदी प्रयोग बंद ही हो गया है ! आज के ज़माने मैं किसी को हिंदी गिनती न तो पढनी आती हैं न ही लिखनी ,आज दूर संचार यंत्रो मैं भी इंग्लिश मैं ही गिनती लिखी होती हैं वही यन्त्र छोटे -छोटे गाँव से लेकर बड़े शहरों मैं प्रोयोग हो रहा हैं तो कोई हिंदी क्यों शिखेगा अगर उसका प्रोयोग ही नहीं हो तो ,आज हम पाश्चात्य सभ्यता मैं इतने डूब गए की अपनी मातु-भाषा ही भूल गए .आज भर्ष्टाचार,बलात्कार ,चोर बाजारी के लिए लड़ रहे हैं किन्तु कोई हिंदी भाषा के लिए नहीं लड़ रहा ! अगर हमने हिन्द भाषा खो दी तो अपने सारे संस्कार को दिए .हिंदी भाषा का काम प्रयोग होने का मुख्य कारण हिंदी फिल्म हैं जो नाम की हिन्द फिल्म हैं पर सारे सवांद उसमें इंग्लिश मैं ही होते हैं

mukesh tiwari के द्वारा
September 9, 2013

आज के इस युग मे लोग हिंदी को ना पसंद करने लगे है ,स्कूल में भी हिंदी का अस्तित्व कम हो गया है सरकारी कामो माँ भी ज्यादा इंग्लिश का उपयोग हो रहा है

Mukesh Sharma के द्वारा
September 9, 2013

हिंदी हमारी रास्टीय भाषा हे , इसको भूलना नहीं हे हम सब भारतीयों को मिलकर अपनी रास्ट्र भाषा पर जोर देना चाहिए ! तभी हम सब भारतीयों को सम्मान मिलेगा बिदेसो में. आपका देश भक्त मुकेश शर्मा जी.

Bhuwan Singh के द्वारा
September 8, 2013

Mujhe Bahut Garv H Apne Desh Per Or Apne Hindustaniyo per jo Hindi Ko Bahut Chahte H Hame Apni Hindi Kavi Nhi Bhulni Chahiye, Ye Hamari Matra Bhasa H. Hindi Me Ham Har Chij Ka Lupt Utha Sakte H Chahe Kabitaye ho Ya Rochak Kahaniya ya Fir Achhe Dharmik Lekh, Sabhi Hindi Me Bahut Jaan Bharne Ka Kaam Karti H. Hindi Se Badkar Duniya Me Kuchh V Nhi. Bharat Se Badkar World Me Dusra Esa Koi Desh V Nhi Jaha Savi Ka Adar Kiya Jata H or Yaha Ki Sanskriti Bahut Mahan H Ye Kahna V Ik Garv H. Hame Apne Hindi Par Bahut Garv H.Me Savi Bhai-Bahano, Lekhak, Pathako or Isme Yogdaan Dene Walo Ka Bahut Dhanyawaad Karta Hu. Aaj Hindi Poore World Me Boli Jati H. Bidesho Me V Iske Lekhak Or Pathako Ki Sankhya Bahut H. जय हिऩद

madan mohan bhatt के द्वारा
September 8, 2013

HINDI M YA MISTAKE CHHU, ANGREJI M CHHU GALTI HAR SAWALOK JAWAB,ANGREJI M YA JALDI BULAN FEE GEY ANGREJI M ,ANGREJI AO YA NIOO HEGO YO FESAN AJ, U SAHY HO YA NIHOO HE WAQTA TERKHOR,AB HINDI DIWAS MANAL KEK KATY, BAATY KHAL,OR JAAGI DI NIMAL FIR HINDIK JANAMBAR M YAN ANGREJI M BULAL, YAAA ANGREJI M BULAL .

Neena mandilwar के द्वारा
September 7, 2013

जागरण को इस पहल केलिए साधुवाद

Shiv Kumar Patel के द्वारा
September 6, 2013

                                                                 हिंग्लिश                                                                                                                                  हिन्दी ब्लागिंग का हिंग्लिस स्वरूप निश्चित तौर पर हिन्दी के मूल       स्वरूप को बिगाड़ेगा, इससे हिन्दी को भले ही व्यापक स्तर पर स्वीकार कर लिया, जाए लेकिन यह हिन्दी को उसके मूल स्वरूप व मूल लिपि से दूर ले जाता है,जो सही नही है।

ushataneja के द्वारा
September 5, 2013
anjali arora के द्वारा
September 4, 2013

Hindi divas ka din bahut pyara hai, is din hone wala ye contest bahut nyara hai, jab se jana iske baare main ,dil jhoom utha humara hai, ab to sab ko ye batana hai, hindi ka alakh jagana hai,

SATYENDRA KATYAYAN के द्वारा
September 4, 2013

jai ho

manish kumar के द्वारा
September 4, 2013

mai dhanyad kahana chahata hoon.jagran juction ka.unohone mujhe mauka diya hai. sabse pahle hindi ke barre me mai kahna chahate hoon. hindi hamari rashtra bhasa hai. hindi ko humlogo ko sartaj ke tarah paryog karna chahiye. aaj ke dino me bhale hi english bahut bara roop le liya ho lekin hindi ko maan or samaan utna hi milega jitna ek bhakta apne bhaagwan ko samaann deta hai.atah hindi ko humlogo ko english से जयादा महत्व dena चाहिय. धन्यवाद.

Shiv Kumar Patel के द्वारा
September 3, 2013

           हिन्दी भाषा ने समाज में उस समय अपना महती य़ोगदान दिया था,जब देश गुलामी की जंजीर में बंधा था। मुंशी प्रेमचन्द की रचनाएँ इसकी साक्षी हैं।इन रचनाओं ने उस समय समाज में जो जागृति,जो चेतना फैलायी थी , वह काबिले-तारीफ थी।           हिन्दी बखूबी एक सम्मानजनक भाषा के रूप मुख्य धारा में लायी जा सकती है,इसके लिये हमे सबसे पहले हिन्दी को  राष्ट्रभाषा बनाना होगा,और हिन्दी ब्लॅागिंग भी हिन्दी के विकास के लिए काफी सहयोगी है।

BABUL KUMAR SINGH के द्वारा
September 3, 2013

हिंदी को बाज़ार की भाषा न कही जाये क्यूंकि ये हमारी मात्रभाषा है, और हमें अपनी भाषा पर गर्व है, हा मई इस बात से सहमत हूँ की हिंदी अब गरीबो की भाषा बनकर रह गयी है, क्यूंकि अमिर लोग अपनी अमीरी दिखाने के लिए हिंदी का कुछ सब्द बोलते है वो बड़े कष्ट से बोल पते है.

satinder bagga के द्वारा
September 2, 2013

कांटेस्ट कहते हो स्वयं को भारतवासी , तो गर्व से अपनाओ उस भाषा को जिसे नाम दिया हमने हिंदी. करो हर भाषा का सम्मान सभी , करो जीवन में उपकार सभी,पर भूलों न अपनी भाषा को क्योकि हिन्द की भाषा है हिंदी . मुगलों ने थोपी हमपर उर्दू , अंग्रेजों ने है अंग्रेजी थोपी , स्वराज मिला तबभी हमसे क्यों अपनाई गयी नहीं हिंदी . हिंदी को है आदर दिलवाना , तो राजभाषा बनवाओ हिंदी . करो दरकिनार मत हिंदी को , तुम्हे पार लगाएगी हिंदी . हिन्द में ही अगर ना सम्मान दिया , तो कौन कहेगा हमको हिंदी

amarsin के द्वारा
September 2, 2013

जागरण परिवार को मे बहुत शुभ कामनाए देना चाहूँगा, की उन्होने हिन्दी दिवस पर इतना अच्छा विषय दिया। वाकई यह मात्रभाषा के प्रति अति सरहनीय कदम होगा। ….. मातृ भाषा होने के कारण हिन्दी अत्यंत ही सरल भाषा भी है इसलिए हमें अपनी मातृ भाषा को लेकर कभी हीन-भावना से ग्रसित नहीं होना चाहिए अपितु अपनी मातृभाषा द्वारा अपने विचारों का सरलतापूर्वक आदान-प्रदान कर इस पर हमें गौरवानिवत होना चाहिए कि हमारी एक अपनी पृथक भाषा और पहचान हिन्दी के रूप में हमें प्राप्त हुर्इ जो हमें किसी उधार में न मिलकर, अपने प्राचीन ऋषियों-मुनियों द्वारा विरासत स्वरूप प्राप्त हुर्इ। जिसे हमें किसी सुपुत्र की भांति उसके विकास में अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान करना चाहिए। http://amarsin.jagranjunction.com/2013/09/02/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%82-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4/

satyabir के द्वारा
August 31, 2013

क्या हमने अपने ब्लॉग को जागरण स्टेज पर बोलना है या लिखकर आपको मेल करना है क्या प्लीज मेरे को अपडेट करना मेरे मेल पर

AJEET KUMAR PANDEY के द्वारा
August 31, 2013

हिन्दुस्तान मे ही उपेक्षित हिन्दी की दुर्दशा को देखते हुए जागरण परिवार ने जो हिन्दी को सम्मान दिया है. लोगो के जेहन मे हिन्दी के प्रति जो लगाव या जागरूकता का भाव जगा है उसमे जागरण का बहुत बड़ा योगदान है |लेकिन हिन्दुस्तान के राजनेता हिन्दी मे भाषण देना अपनी अवहेलना समझते है|जागरण परिवार की तरह ही राजनेताओ को भी हिन्दी भाषा के सम्मान मे हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा घोषित कर देना चाहिए …

नीरज के द्वारा
August 31, 2013

जब जागरण जंक्शन परिवार ने पुरस्कारों की श्रेणियां बनाई है तो फिर जीतने वाले के लिए कुछ उपहार भी देने का फैसला किया होगा . क्या आप हमे उपहारों के नाम बता सकते है ?

राखी के द्वारा
August 31, 2013

पुरस्कारों की श्रेणियां काफी आकर्षित है विशेष रूप में ब्लॉग ‘शिरोमणि’ पुरस्कार और ब्लॉग ‘मंजूषा’ पुरस्कार

अनुराग के द्वारा
August 31, 2013

‘हिन्दी बाजार की भाषा है, गर्व की नहीं’ … ‘हिंदी गरीबों, अनपढ़ों की भाषा बनकर रह गई है’  यह आज का सच है। जागरण जंक्शन को धन्यवाद करता हूं हिंन्दी से संबंधित प्रतियोगिता अपने मंच पर चलाने के लिए।

राज के द्वारा
August 31, 2013

ऐसा प्रयास करते रहना चाहिए. ताकि लोगों को हिन्दी भाषा का महत्व पता चलते रहे.

पूजा के द्वारा
August 31, 2013

आज जिस तरह हिन्दी का महत्व खोता जा रहा. उसे बचाने के लिए आपलोगों का ये प्रयास काफी कबिले तारीफ हैं.

लावाण्या के द्वारा
August 31, 2013

हिन्दी दिवस पर आपलोगों ने हिन्दी के खोते महत्व को ध्यान रख कर जो ये प्रतियोगीता रखा है. वो काफी काबिले तारीफ है.

Vinod Kumar Raj के द्वारा
August 31, 2013

हिन्दी-हिन्दी बोलने मे लोगो को शर्म आती है ,अपनी मा को मा कहने मे लोगो को शर्म आती है,कितनी फितरत कि बात है।यदी मार्केट मे अपनी बहन के साथ घुम रहे है तो ,अपनी बहन को बहन कहने मे शर्म आयेगी तो क्या बहन को गर्लर्फेन्ड कहेगे। यदि हा तो आप असली हिन्दू नही है। सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम है । यदि नही तो फिर क्यो भूल रहे है हिन्दी को। एक असली हिन्दू की पहचान है कि वह हिन्दी   आप को पता हो कि हिन्दी शब्द की उत्पति हिमालय पर्वत से निकलने वाली नदीयो के मधुर  जलाधर से होती है। जो  एकदम पवित्र है। शायद आप को न पतो  हो कि  शुध्द हिन्दी बोलने वाले व्यक्ति का मानसिक सन्तुलन कभी नही गडबड होता है।जय हिन्द -आगे आप की सोच।

Vinod Kumar के द्वारा
August 31, 2013

Hindi Bazar ki bhasha hai garv ki nahi-Jo kog kahe ki hindi bazar ki bhasha hai garv ki nahi unase bada murkh is Bharat koi hai hi nahi.Yadi maa budi ho jaye to kya use maa nahi kahenge,bagal vali 20 sal ki ladaki ko maa kahenge.Hamari Rashtra bhasha hai aur rahegi Hindi. Duniya ki sabhi bhashao ki janani hai Hindi,hindi ke sabhi wrdo ko tod-jod ke banayi gayi hai any bhashaye.Aur hindi Divas ko jamakar manaya jay aur logo ko jagruk kiya jaye.Jay Hind,Jay Hindi ,Jay Bharat .


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